चिकित्सक: सेवा, संवेदना और समर्पण का पर्याय
- डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा
चिकित्सक ' चिकित्सा ' शब्द में निहित ' चित् ' ( जानना, सोचना ) धातु से बना है अत: रोगी की स्थिति को समझकर उपचार करने वाला चिकित्सक कहलाता है। अँग्रेजी भाषा में डाॅक्टर चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े इस शब्द की उत्पत्ति लेटिन शब्द डाॅक्येर से हुई है,जिसका अर्थ सिखाना या पढ़ाना होता है। मध्यकाल में विश्वविद्यालय के विद्वानों को यह उपाधि दी जाती थी, जो बाद में चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए भी प्रचलित हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि चिकित्सक केवल उपचारक ही नहीं, स्वास्थ्य शिक्षक भी है,जो समाज को रोगों से बचाने, स्वच्छता अपनाने, संतुलित जीवन शैली विकसित करने तथा स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की प्रेरणा देता है। भारत की चिकित्सा परम्परा विश्व की सर्वाधिक प्राचीन और समृद्ध चिकित्सा परम्पराओं में से एक है। वैदिक काल के ऋग्वेद और अथर्ववेद में अनेक रोगों, औषधियों तथा उपचार पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा विज्ञान की आधारशिला रही है। आचार्य चरक कृत ' चरक संहिता ' आयुर्वेद का प्रमुख ग्रंथ है। आचार्य सुश्रुत को विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक माना जाता है। इनके द्वारा रचित ' सुश्रुत संहिता ' शल्य चिकित्सा का प्रामाणिक ग्रंथ है।मध्यकाल में यूनानी चिकित्सा का प्रभाव बढ़ा, आधुनिक काल में एलोपैथिक चिकित्सा विकसित हुई। आज़ादी के बाद भारत आयुर्वेद,एलोपैथी, होम्योपैथी, यूनानी तथा योग जैसी विविध चिकित्सा प्रणालियों का समन्वित स्वरूप प्रस्तुत करता है।
भारत में ' राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस ' हर वर्ष 01 जुलाई को प्रसिद्ध चिकित्सक एवं पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ०विधान चन्द्र राॅय की जयन्ती-पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह दिवस चिकित्सा के क्षेत्र में डाॅक्टरों के अमूल्य योगदान, निस्वार्थ सेवा को सम्मानित करने हेतु समर्पित है। आईएमए द्वारा इस दिन की शुरुआत पहली बार 1919ई०में की गई थी। वस्तुत: चिकित्सा व्यवसाय नहीं, मानवीय दायित्व है, जिसमें ज्ञान के साथ-साथ संवेदनशीलता, धैर्य, करुणा और सेवा भावना होना अनिवार्य है। रोगी जब चिकित्सक के पास पहुँचता है तब वह दवा नहीं चाहता, आश्वासन, विश्वास और सहानुभूति चाहता है। चिकित्सक का मधुर व्यवहार, संवाद तो औषधि से अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। रोगी के कष्ट को समझना, आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की सहायता करना, समाज को स्वस्थ जीवनशैली के लिए प्रेरित करना,रोग की रोकथाम हेतु जनजागरण करना उसकी कार्यसेवा का धर्म है, इसीलिए चिकित्सक को मानवता का सेवक कहा जाता है। चिकित्सक के व्यक्तित्व में संवेदना अपेक्षित है। एक संवेदनशील चिकित्सक रोगी को केवल ग्राहक अथवा केस नहीं मानता अपितु उसे एक जीवित, भावनात्मक और सामाजिक व्यक्ति के रूप में देखता है, रोगी को ध्यान से सुनता व उसके भय और चिंता को समझता है, उपचार की स्पष्ट जानकारी देता है एवं परिजनों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता है। चिकित्सकीय सेवा में समर्पण की भावना, कर्तव्य के प्रति निष्ठा सर्वोच्च गरिमा को स्थापित करती है। प्राकृतिक आपदाओं, महामारी, युद्ध, दुर्घटनाओं एवं कठिन परिस्थितियों के समय चिकित्सकों का समर्पण समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
सारत: चिकित्सा अन्य व्यवसायों से परे सेवा-प्रधान पेशा है। समाज उसे धरती का भगवान कहता है। उसकी सेवा, संवेदना और समर्पण की भावना ही समाज को जीवन का विश्वास देता है। प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथों में चिकित्सकीय आचार संहिता का विस्तृत उल्लेख मिलता है। चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि चिकित्सक को सत्यवादी, संयमी,विनम्र,करुणामय तथा सेवाभाव से युक्त होना चाहिए। रोगी-चिकित्सक सम्बन्ध चिकित्सा व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। यह सम्बन्ध औषधि और उपचार तक सीमित नहीं होता अपितु विश्वास,संवेदना, सहयोग तथा पारस्परिक सम्मान पर आधारित होता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में चिकित्सकों की भूमिका व्यापक है किन्तु विशाल जनसंख्या, चिकित्सकों का अभाव, आर्थिक विषमता, अशिक्षा, कुपोषण यहाँ अनेक चुनौतियाँ हैं, इन विषम परिस्थितियों में एक आदर्श चिकित्सक वही है जो मानवीय करुणा के साथ जोड़कर रोगियों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करे।
- डाॅ०राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
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