लघु कथा :
जाति ना पूछो खून की
ज़िला अस्पताल के बाहर अफरा-तफरी मची थी। शहर के नामी वकील श्री नंदलाल जी का पुत्र सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो कर अस्पताल के अचेत पड़ा हुआ था l
“ओ निगेटिव खून चाहिए तुरंत, समय पर ना मिल पाने पर जान बचाना मुश्किल होगा एक एक पल क़ीमती है ” डॉक्टर ने लगभग चीखते हुए कहा।
श्री नंदलाल और परिजन बदहवास से हाथों में पर्ची लिए एक से दूसरे व्यक्ति के पास दौड़ रहे थे। तभी अस्पताल के सुरक्षा-गार्ड ने कहा- “सर , ब्लड बैंक के पास एक लड़का बैठा है। हर तीन-चार महीने में रक्तदान करने आता है। उस से बात करिए शायद उसका यही ग्रुप है अगर नहीं होगा तो व्यवस्था करवा सकता होगा तो कर देगा।
घबराए हुए पिता उस लड़के के पास गये। जो व्यक्ति अदालत में हर बहस जीतता था आज एक अनजान युवक के सामने हाथ जोड़े खड़ा था- “ बेटा मेरा पुत्र घायल पड़ा है उसे ओ निगेटिव खून की जरूरत है, सुरक्षा गार्ड ने बताया तुम्हारा यही ब्लड ग्रुप है, मेरे पुत्र को बचा लो मैं हर कीमत देने को तैयार हूँ “।
लड़का मुस्कुराया बोला- “सर क़ीमत की बात बाद में करते है चलिए पहले आपके बेटे के लिए ख़ून दे दूँ”।
“ओहो खून मैच कर गया “ डॉक्टर ने राहत की सांस ली। खून चढ़ना शुरू हो गया। वकील साहब की पत्नी रोते हुए उस अनजान रक्त दाता के पास पहुँचीं।
”बेटा, तुमने हमारे बच्चे को दूसरा जन्म दे दिया। तुम्हारा नाम क्या है?”
“रवि।” एक संक्षिप्त सा जबाब आया
“कहाँ के हो?”
“यहीं पास के गाँव का।”
उन्होंने हिचकिचाते हुए अगला प्रश्न पूछा, “बेटा… कौन से बिरादरी के हो”
“अभी तो डॉक्टर ने मेरे खून की जाँच की थी, जाति की नहीं।” रवि ने शांत स्वर में जबाब दिया।
श्रीमती नंदलाल की आँखें झुक गईं।
उसी समय डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराते हुये बोले, “ धड़कने सामान्य हो रही हैं ,मरीज अब ख़तरे से बाहर है”।
श्रीमती नंदलाल ने काँपते हाथों से रवि का हाथ थाम लिया।
इस बार उनके होंठों पर कोई प्रश्न नहीं था। सिर्फ़ इतना कहा—
“आज पहली बार समझ में आया… खून की कोई जाति नहीं होती, जाति तो सोच की है”।
रवि मुस्कराया और रक्तदान का प्रमाणपत्र जेब में रखा और चुपचाप चला गया।
उस दिन अस्पताल से केवल एक युवक को ही नया जीवन नहीं मिला था; सदियों पुरानी एक सोच भी दम तोड़ रही थी और उपचार पाकर बाहर आई थी।
- साधना
अरविंद विहार
भोपाल म.प्र.
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कथा कहानी
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