काव्य :
एक मुक्त छंद -
' और वृक्ष लेट गया '
अचानक ही,
दृश्य बदल गया।
थोड़ी सी,
बारिश हुई,
और वृक्ष लेट गया।
थी 'ऊंची' टेकरी,
जिस पे वो बढ़ा।
' भूमि ' थी ,
पुख्ता कोई,
जिस पे वो रहा खड़ा।
पीढ़ियों से वो,
'शहर' देख रहा था।
मुखिया जैसा,
'ध्यान' रख रहा था।
अब,
कौन किसी को,
क्या समझाए ?
कैसे लेटा ये,
वृक्ष विशालकाय ?
पूछने को जब,
जीव खास आ गए।
झर-झर बहते,
अश्रु संग,
घास छोटी ये बतलाए।
लेटने के क्रम में,
ये तो है अंतिम कड़ी,
दुनियां कब ये समझेगी,
सब पर,
भारी मार पड़ी।
लेटी व्यवस्था,
शिक्षा और परीक्षा की।
ज्यों-ज्यों ये व्यापार हुए,
टूटी गरिमा,
शिक्षक-परीक्षक,
और चिकित्सक की।
बिकी,
नकली दवाइयां,
बिके,
डाक्टर भी।
धीरे-धीरे,
सांसें कितनी,
इनने तोड़ी।
भीड़ भरी जगहों पे,
यातायात गया लेट।
अतिक्रमण,
हटाने वाले,
हट गए,
पाकर कोई भेंट।
स्वास्थ्य-पुलिस,
परिवहन -रंजन,
चौबीस घंटे की अवस्था।
तो छुट्टी क्यों ले,
न्याय व्यवस्था ------ ?
फिर ,
आई एक विकृति।
टूटी धूरी संस्कृति की।
जो थी,
ममता की मूरत सी।
वो ही ,
हिंसक जीव बनी !
स्त्री ने तो,
लाज रखी थी।
जम्बूद्वीप की प्राण वही थी।
जो स्तंभ था,
गर्व हमारा ।
वो ही देखो नहीं रहा।
फिर मन के भीतर,
कुछ बैठ गया।
जी हां,
और वृक्ष लेट गया !
--डा.ऋषु,छिंदवाड़ा (म.प्र.)
विचारक-विश्लेषक
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