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अनंत का धागा : विश्वास और संकल्प की कथा - मधूलिका श्रीवास्तव ,भोपाल


अनंत का धागा : 
विश्वास और संकल्प की कथा 

- मधूलिका श्रीवास्तव ,भोपाल

धागा है छोटा-सा, 
विश्वास अनंत,
मन में जगा दे जो, 
वह संकल्प अनंत।
हर गाँठ में श्रद्धा हो,
हर गाँठ में आस,
हर स्पंदन में बसता हो, 
प्रभु का विश्वास।

धागा भले ही हो सूत का, 
पर अर्थ इसका गहन
विश्वास जहाँ अनंत हो, 
वहीं बसे नारायण।

शायद इसी विश्वास और संकल्प की डोर का नाम है—अनंत।
जी हाँ, आज मैं अनंत चतुर्दशी की ही बात कर रही हूँ।
भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। यहाँ वर्ष भर कोई न कोई पर्व, कोई न कोई उत्सव हमारे जीवन में उल्लास और नई ऊर्जा भरता रहता है। भारतीय त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि इनके साथ ऋतु-परिवर्तन, कृषि, परिवार, धर्म, लोकविश्वास और सामाजिक संबंधों की अनेक परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। हमारे यहाँ तो अंग्रेजी नववर्ष के आगमन का भी उत्सवपूर्वक स्वागत किया जाता है।

भारतीय पर्वों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके पीछे केवल परंपराएँ ही नहीं, बल्कि ऐसी कथाएँ और जीवन-संदेश भी छिपे हैं, जो मनुष्य को आस्था, संयम, विश्वास और अपने संकल्प के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा देते हैं।

कल अनंत चतुर्दशी थी—या यूँ कहें कि गणेशोत्सव के समापन का दिन। इस दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। गणेश विसर्जन केवल प्रतिमा को जल में विसर्जित करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के एक गहरे सत्य का स्मरण भी कराता है—जो आया है, उसे एक दिन जाना भी है।

अनंत चतुर्दशी एक ओर हमें विश्वास और संकल्प से जोड़ती है, तो दूसरी ओर गणेश विसर्जन हमें मोह से मुक्त होकर परिवर्तन को स्वीकार करना सिखाता है।

अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है और श्रद्धालु अपनी बाँह पर अनंत सूत्र धारण करते हैं। ‘अनंत’ अर्थात जिसका न आदि है, न अंत। भगवान विष्णु के इसी अनंत स्वरूप को धारण  करने के लिए यह सूत्र बाँधा जाता है।

अनंत चतुर्दशी से जुड़ी प्रसिद्ध कथा राजा कौंडिन्य और उनकी पत्नी सुशीला की है।

कहा जाता है कि एक दिन सुशीला ने कुछ स्त्रियों को विशेष पूजा करते हुए देखा। कौतूहलवश उन्होंने पूछा कि वे कौन-सी पूजा कर रही हैं। स्त्रियों ने उन्हें अनंत व्रत की महिमा और विधि बताई। सुशीला ने श्रद्धापूर्वक अनंत भगवान की पूजा की और पूजा के बाद चौदह गाँठों वाला अनंत सूत्र अपनी बाँह में धारण कर लिया।

लेकिन उनके पति कौंडिन्य ने उस सूत्र को महत्त्वहीन समझा। उन्होंने उसे केवल एक साधारण धागा माना और एक दिन क्रोध में उसे उतारकर अग्नि में डाल दिया।

इसके बाद जैसे उनके जीवन से सुख-शांति रूठने लगी। धन-संपत्ति नष्ट होने लगी और अनेक कठिनाइयाँ उनके सामने आने लगीं। तब कौंडिन्य को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ में आया कि बात केवल एक धागे की नहीं थी; उस धागे में आस्था, विश्वास और संकल्प बँधा हुआ था।

यहीं से इस अनंत सूत्र का गहरा जीवन-संदेश हमारे सामने आता है।

धागा छोटा हो सकता है, लेकिन उसमें बँधा विश्वास बहुत बड़ा होता है।

भगवान विष्णु के अनंत सूत्र में चौदह गाँठें लगाई जाती हैं। परंपरा में इन्हें चौदह लोकों से जोड़ा जाता है। लाल रंग का यह सूत्र भगवान के प्रति आस्था और अपने संकल्प के प्रति दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है।

अनंत चतुर्दशी हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में प्राप्त सुख-सुविधाओं को केवल अपना अधिकार या अपना पुरुषार्थ मानकर अहंकार नहीं करना चाहिए। मनुष्य का पुरुषार्थ आवश्यक है, लेकिन उसके साथ विनम्रता और कृतज्ञता भी उतनी ही आवश्यक है। यही इस छोटे-से अनंत धागे का सबसे बड़ा संदेश है—

जीवन की डोर कितनी भी कमजोर दिखाई दे, यदि उसमें विश्वास की गाँठें बँधी हों, तो वह मनुष्य को कठिन से कठिन समय में भी सँभाल सकती है।

और जब हम इस सूत्र को अपनी बाँह पर बाँधते हैं, तो इसे केवल एक परंपरा मानकर न बाँधें। इसे अपने भीतर के भय पर विश्वास की विजय का प्रतीक बनाएँ। इसे अपने टूटते मन को सँभालने का संकल्प बनाएँ। जब परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध हों, जब रास्ते धुँधले दिखाई दें, जब अपने ही निर्णयों पर संदेह होने लगे—तब यही अनंत की डोर हमें भीतर से पुकारे और कहे—

रुको मत, टूटो मत, अपने विश्वास से हटो मत।

तो साथियों आज हम सब अपने भीतर एक ऐसी गाँठ बाँधें, जो कभी ढीली न पड़े—सत्य की गाँठ, करुणा की गाँठ, कर्तव्य की गाँठ और अपने संकल्प पर अडिग रहने की गाँठ। हम यह संकल्प लें कि सफलता मिले तो अहंकार नहीं करेंगे, असफलता मिले तो निराश नहीं होंगे; सुख मिले तो कृतज्ञ रहेंगे और दुःख आए तो धैर्य नहीं छोड़ेंगे।

यही भारतीय संस्कृति की सबसे सुंदर विशेषता है कि यहाँ पर्व केवल मनाए नहीं जाते, वे हमारे भीतर सोई हुई चेतना को जगाते हैं और हमें जीवन जीने की दृष्टि देते हैं।

इसी विश्वास और संकल्प के साथ और इसी अनंत आस्था के साथ आप सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और विश्वास का प्रकाश बना रहे।
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 - मधूलिका श्रीवास्तव 
E-101/17 शिवाजी नगर 
भोपाल (म.प्र.)(462016)
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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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