रामधारी सिंह दिनकर की काव्य-चेतना
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के सिमरिया गाँव में हुआ और 24 अप्रैल 1974 को मद्रास में उनका निधन हुआ था। वे कवि होने के साथ निबंधकार, चिंतक, आलोचक, पत्रकार और सांस्कृतिक विचारक भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के उथल-पुथल भरे दौर में उनकी काव्य-चेतना विकसित हुई। औपनिवेशिक दमन, राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा, सामाजिक विषमता और भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता उनके आरंभिक लेखन की पृष्ठभूमि बने। ‘रेणुका’ (1935), ‘हुंकार’ (1938), ‘कुरुक्षेत्र’ (1946), ‘रश्मिरथी’ (1952) और ‘उर्वशी’ (1961) उनकी काव्य-यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
गद्य में ‘मिट्टी की ओर’, ‘अर्धनारीश्वर’ और ‘संस्कृति के चार अध्याय’ जैसी अमर कृतियाँ उनकी व्यापक वैचारिक दृष्टि स्पष्ट करती हैं।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार और ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ सम्मान मिला था। इस प्रकार दिनकर का रचनाकाल केवल स्वतंत्रता-पूर्व संघर्ष का समय नहीं था । उसमें स्वतंत्रता के बाद के भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक बेचैनियाँ भी निरंतर दिखाई देती रहीं।
दिनकर की काव्य-चेतना को समझने के लिए सबसे पहले उनकी राष्ट्रीय चेतना को समझना आवश्यक है। पराधीन भारत में पली उनकी संवेदना स्वाभाविक रूप से स्वतंत्रता और स्वाभिमान की आकांक्षा से जुड़ी हुई थी। लेकिन उनका राष्ट्रवाद केवल मातृभूमि के प्रति भावुक काव्य उद्गार नहीं है। उसमें जनता की शक्ति और उसके अधिकार का बोध भी निहित दिखता है।
‘जनतंत्र का जन्म’ में वे लिखते हैं, “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” यह पंक्ति सत्ता के सामने जनता की उपस्थिति की घोषणा है। दिनकर के काव्य में राष्ट्र का अर्थ केवल राजसत्ता नहीं, बल्कि वह सामान्य मनुष्य है जिसके श्रम से देश बनता है। इसलिए उनकी राष्ट्रीय चेतना धीरे-धीरे जनचेतना में रूपांतरित हो जाती है।
यहीं से दिनकर की कविता का दूसरा महत्वपूर्ण स्वर, विद्रोह और प्रतिरोध, उभरता है। अन्याय के सामने चुप रहना उन्हें स्वीकार नहीं था। ‘समर शेष है’ में वे लिखते हैं, “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, / जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।”
दिनकर के लिए संघर्ष का अर्थ हिंसा का उत्सव नहीं है। उनका प्रश्न यह है कि जब अन्याय सामने हो, तब मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी क्या हो? तटस्थता कब निष्पक्षता नहीं, बल्कि अन्याय को मौन समर्थन देने जैसी हो जाती है? इसीलिए उनका विद्रोह केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक विद्रोह भी है।
‘रश्मिरथी’ का कर्ण उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओ में है। महाभारत का कर्ण दिनकर के यहाँ जन्म और जाति से परिभाषित व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रतिभा, पुरुषार्थ और आत्मसम्मान से अपना मूल्य सिद्ध करने वाला मनुष्य है। कर्ण की वाणी में दिनकर का सामाजिक प्रश्न मुखर हो उठता है, “पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से।” कर्ण का यह कथन जन्माधारित पहचान के सामने कर्म और सामर्थ्य की प्रतिष्ठा है।
यही कारण है कि ‘रश्मिरथी’ केवल कर्ण की कथा नहीं रह जाती । वह सामाजिक भेदभाव से मुक्त मनुष्य की गरिमा का काव्य बन जाती है।
कर्ण के माध्यम से दिनकर ने उस प्रतिभा की पीड़ा को स्वर दिया , जिसे सामाजिक व्यवस्था पहचान देने से इनकार कर देती है। कर्ण दया नहीं माँगता। वह अपने पुरुषार्थ के आधार पर सम्मान चाहता है। यही दिनकर की सामाजिक दृष्टि की विशेषता है। वे वंचित मनुष्य को केवल करुणा का पात्र नहीं बनाते, बल्कि उसके भीतर प्रतिरोध और आत्मविश्वास की शक्ति देखते हैं। इसीलिए उनका मानवतावाद दीनता का महिमामंडन नहीं करता। वह मनुष्य को उसकी प्रतिभा की गरिमा के साथ देखता है।
वीरता दिनकर की कविता का एक अत्यंत प्रसिद्ध पक्ष है, लेकिन उनकी वर्णित वीरता को भी व्यापक अर्थ में देखना आवश्यक है।
‘रश्मिरथी’ की पंक्ति, “क्षमा शोभती उस भुजंग को, / जिसके पास गरल हो”, उनकी शक्ति-दृष्टि का सार है। उनके लिए क्षमा निर्बलता से पैदा हुई विवशता नहीं, सामर्थ्य से उत्पन्न उदारता है। जो अन्याय का प्रतिरोध कर सकता है, वही वास्तविक अर्थ में क्षमा का अधिकारी है। दिनकर की शक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह आत्मसम्मान और न्याय की रक्षा करती है। इसीलिए उनकी वीरता केवल रणभूमि की वीरता नहीं रह जाती।
दिनकर का काव्य एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है। वे शक्ति के कवि हैं, किंतु युद्ध के अंध-समर्थक नहीं हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ में महाभारत के युद्ध को आधार बनाकर वे हिंसा, विनाश, न्याय और शांति के प्रश्नों पर विचार करते हैं। यह कृति द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके व्यापक मानवीय अनुभवों के बाद के वातावरण से भी संवाद करती है। महाभारत का युद्ध उनके लिए केवल अतीत की घटना नहीं , वह आधुनिक मनुष्य के सामने आज तक खड़ा नैतिक प्रश्न है।
‘कुरुक्षेत्र’ में दिनकर की वैचारिक दृष्टि यह स्वीकार करती है कि अन्यायपूर्ण शांति भी शांति नहीं है। केवल युद्ध से बच जाना पर्याप्त नहीं होता । न्यायपूर्ण व्यवस्था आवश्यक है। इसी कारण उनके यहाँ शक्ति और शांति परस्पर विरोधी नहीं हैं। शक्ति अन्याय रोकने के लिए आवश्यक हो सकती है और शांति मनुष्य की अंतिम आकांक्षा है। दिनकर का यह द्वंद्व उनके काव्य को सरल नारे से बचाकर विचार की गहराई देता है।
दिनकर की एक बड़ी विशेषता इतिहास और मिथक का आधुनिक पुनर्पाठ है। उन्होंने महाभारत के पात्रों को केवल पौराणिक चरित्र बनाकर नहीं रखा। वे उनके भीतर अपने समय के प्रश्न खोजते हैं। कर्ण सामाजिक न्याय का प्रश्न बनता है। कुरुक्षेत्र युद्ध और शांति का प्रश्न बनता है। कृष्ण का शांति-प्रयास सत्ता और न्याय के संबंध पर विचार करने का अवसर देता है। ‘रश्मिरथी’ में कृष्ण के सामने कर्ण का पक्ष और पाँच गाँव का प्रसंग इस बात को रेखांकित करता है कि संघर्ष से पहले न्यायपूर्ण समाधान का प्रयास आवश्यक है। इस प्रकार दिनकर के लिए मिथक अतीत में बंद कथाये नहीं, वर्तमान से संवाद करने वाली जीवित संवेदनाये है।
उनकी सांस्कृतिक चेतना भी इसी व्यापक दृष्टि का विस्तार है। दिनकर भारतीय संस्कृति को किसी संकीर्ण सीमा में नहीं देखते। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ उनके गद्य का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, लेकिन उसकी मूल दृष्टि उनकी कविता में भी दिखाई देती है। वे भारत को केवल भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखते हैं। “भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है।” आगे वे कहते हैं, “जहाँ कहीं एकता अखण्डित, जहाँ प्रेम का स्वर है, / देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है।” यहाँ भारतीयता किसी एक जाति, भाषा या क्षेत्र की संपत्ति नहीं रह जाती। वह एकता, प्रेम और मानवीय शील से निर्मित व्यापक सांस्कृतिक चेतना बन जाती है।
दिनकर की सांस्कृतिक दृष्टि का यह समन्वय उनके राष्ट्रवाद को भी व्यापक बनाता है। उनके लिए राष्ट्र की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। संस्कृति कोई जड़ परंपरा नहीं, बल्कि निरंतर संवाद और आदान-प्रदान से विकसित होने वाली जीवंत प्रक्रिया है। वे अतीत से ऊर्जा लेते हैं, लेकिन वर्तमान के प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ते।
दिनकर की काव्य-यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव प्रेम और सौंदर्य की चेतना है, जो ‘उर्वशी’ में अपने पूर्ण विस्तार के साथ मुखर दिखती है। ‘हुंकार’ का ओजस्वी और ‘रश्मिरथी’ का संघर्षशील कवि ‘उर्वशी’ में प्रेम, देह, कामना और सौंदर्य की जटिल अनुभूतियों का कवि बन जाता है। इससे उनके कवि-व्यक्तित्व की व्यापकता प्रमाणित होती है। मनुष्य केवल सामाजिक और राजनीतिक प्राणी नहीं है। उसके भीतर प्रेम की आकांक्षा है, सौंदर्य का आकर्षण है, देह की अनुभूति है और आत्मा की बेचैनी भी है। ‘उर्वशी’ इन्हीं अनुभवों को दार्शनिक धरातल देती है। यह रचना 1961 में प्रकाशित हुई और इसी कृति के लिए दिनकर को ज्ञानपीठ सम्मान मिला।
इस दृष्टि से ‘उर्वशी’ को दिनकर की पूर्ववर्ती राष्ट्रीय और वीर काव्यधारा से अलग करके नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक परिणति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। राष्ट्र और समाज के प्रश्नों से जूझने वाला कवि अंततः मनुष्य के भीतर उतरता है। वहाँ उसे प्रेम मिलता है, काम मिलता है, सौंदर्य मिलता है और अस्तित्व का प्रश्न मिलता है। दिनकर की काव्य-चेतना इसीलिए बाहरी संघर्ष से आंतरिक अनुभव तक की अनवरत यात्रा है।
उनकी भाषा और शिल्प उनकी चेतना के अनुरूप निरंतर बदलते हैं। राष्ट्रीयता और विद्रोह के प्रसंग में भाषा ओजस्वी और घोषपूर्ण हो जाती है। सामाजिक प्रश्नों में वह तर्क और चुनौती का स्वर ग्रहण करती है। ‘कुरुक्षेत्र’ में वही भाषा दार्शनिक और चिंतनशील हो जाती है, जबकि ‘उर्वशी’ में उसमें ललित सौंदर्य और संवेदनात्मक कोमलता आ जाती है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ लोकजीवन की सहजता, सूक्ति की संक्षिप्तता के साथ भाव की तीव्रता और मंचीय प्रभाव के साथ वैचारिक गहराई,इन सबका संयोजन दिनकर की भाषा को विशिष्ट दिनकर की भाषा बनाता है।
दिनकर की काव्य-चेतना को इसलिए किसी एक ‘वाद’ में पूरी तरह बाँधना कठिन है। उनमें राष्ट्रीयता है, प्रगतिशील सामाजिक दृष्टि है, परंपरा के प्रति आत्मीयता है, आधुनिक प्रश्नों के प्रति सजगता है और मनुष्य के निजी जीवन के प्रति गहरी संवेदना है। उनका रचनात्मक व्यक्तित्व अपने समय के अनेक वैचारिक प्रवाहों से संवाद करता है, किंतु अंततः अपनी स्वतंत्र पहचान बनाता है। यही कारण है कि उनकी कविता में एक ओर “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का जनतांत्रिक उद्घोष है और दूसरी ओर ‘उर्वशी’ का सूक्ष्म प्रेमानुभव।
समग्रतः दिनकर की काव्य-चेतना, शक्ति, स्वाभिमान, न्याय, राष्ट्र, संस्कृति, प्रेम और मनुष्यता के समन्वय की चेतना है। उनकी राष्ट्रीयता जनचेतना से जुड़ती है, वीरता आत्मसम्मान से, विद्रोह न्याय से, इतिहास वर्तमान से और प्रेम मनुष्य की पूर्णता से। वे अतीत को इसलिए नहीं देखते कि उसमें लौट जाएँ, बल्कि इसलिए कि उससे वर्तमान को समझ सकें। वे मिथक इसलिए नहीं उठाते कि पुरानी कथा दोहरा सकें, बल्कि इसलिए कि उसके भीतर आज के मनुष्य के प्रश्न खोज सकें।
यही दिनकर की स्थायी प्रासंगिकता है। उनका कवि समय के साथ बदलते प्रश्नों के सामने खड़ा दिखाई देता है। उनकी कविता हमें केवल गौरव का अनुभव नहीं कराती, वह प्रश्न भी करती है , मनुष्य की गरिमा कहाँ है? न्याय किसके पक्ष में है? शक्ति का उद्देश्य क्या है? संस्कृति मनुष्य को कितना उदार बनाती है? और अंततः मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली वह कौन-सी शक्ति है जिसके बिना राष्ट्र भी अधूरा है और सभ्यता भी? दिनकर का उत्तर उनकी पूरी काव्य-यात्रा में बिखरा हुआ मिलता है । मनुष्य की गरिमा, न्याय की प्रतिष्ठा और जीवन के प्रति निर्भीक आस्था। यही उनकी काव्य-चेतना का सबसे मानवीय और सबसे स्थायी स्वर है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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