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अनामिका : अर्पण एवं समर्पण- पीयूष तिवारी , पुणे



अनामिका : अर्पण एवं समर्पण

-  पीयूष तिवारी , पुणे

 संस्कृत में शब्दों की निर्मिति और उनके भीतर छिपे अर्थ कई बार बड़े रोचक संकेत दे जाते हैं। आज अपनी नित्य साधना करते  हुए मेरा ध्यान हाथ की एक उंगली पर गया- अनामिका।

हाथ की पाँचों उंगलियों के संस्कृत नाम बड़े अर्थपूर्ण हैं- कनिष्ठिका, अनामिका, मध्यमा, तर्जनी और अंगुष्ठ। इनमें 'अनामिका' शब्द अपने आप में थोड़ा आकर्षित करता है। 'अनाम' यानी जिसका कोई नाम न हो। अनामिका अर्थात जिसका कोई नाम नहीं।

रोचक बात यह है कि पूजा-पद्धति में भगवान को कुछ अर्पित करते समय अनामिका का प्रयोग बहुत बार होता है। चन्दन लगाना हो, अक्षत चढ़ाना हो, पुष्प अर्पित करना हो अथवा किसी देवता को गन्ध समर्पित करनी हो- अनेक कर्मों में अनामिका का प्रयोग दिखाई देता है।

यद्यपि यह केवल एक शारीरिक सुविधा अथवा पूजा की पारंपरिक परिपाटी भर हो सकती है, किन्तु भारतीय दर्शन की दृष्टि से देखें तो इसमें एक अत्यंत सुन्दर सांकेतिक अर्थ समाहित दिखाई देता है।

वैदिक तत्व चिंतन और भारतीय दर्शन का एक केंद्रीय सूत्र है - 'इदं न मम'। 

अर्थात- यह मेरा नहीं है।

यह वाक्य यज्ञ और वैदिक कर्मकाण्ड में बार-बार आता है। किसी वस्तु को अग्नि में समर्पित करते हुए हम कहते हैं- इदं न मम। यह मेरा नहीं है। पहली दृष्टि में यह केवल अर्पण की वस्तु के लिए कहा हुआ वाक्य लगता है, किन्तु इसके भीतर 'ममत्व' को छोड़ने का एक गहरा दर्शन छिपा है।

मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी निर्मिति शायद 'मैं' और 'मेरा' से ही होती है।

मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा धन, मेरा ज्ञान, मेरा पद, मेरी उपलब्धि, मेरा विचार और अन्ततः- "मैं"।

पूजा में जब हम पुष्प भगवान को अर्पित करते हैं तो पुष्प वस्तुतः वही रहता है। परिवर्तन केवल इतना होता है कि कुछ क्षण पहले तक वह 'मेरा पुष्प' था और अब 'भगवान को अर्पित' हो गया।

अर्थात वस्तु से अधिक महत्वपूर्ण उसका "ममत्व" था, जिसे छोड़ा गया।

इसीलिए 'इदं न मम' केवल त्याग का वाक्य नहीं है। यह उस 'मम' को शिथिल करने का प्रयास है, जो प्रत्येक वस्तु के साथ हमें बाँधता है।

और यहीं अनामिका का अर्थ मुझे और रोचक लगता है।

जिस उंगली का अपना कोई नाम नहीं, उसी उंगली से हम ईश्वर को अर्पण करते हैं।

शायद इसे एक दार्शनिक संकेत की तरह देखा जा सकता है- अर्पण केवल वस्तु का नहीं, अपने नाम और अपने 'मैं' का भी होना चाहिए।

जब तक अर्पण करने वाला कहता है- 'मैंने दिया', तब तक कहीं न कहीं 'मेरा' बचा हुआ है।

और अन्ततः प्रश्न वस्तु का भी नहीं रहता। प्रश्न यह हो जाता है कि जिसे मैं 'मैं' कह रहा हूँ, वह भी क्या वास्तव में मेरा है?

नाम और पहचान से बनी हुई हमारी यह 'मैं' की भावना जितनी गहरी होती जाती है, उतना ही समर्पण कठिन होता जाता है। शायद इसीलिए साधना में बाहरी अर्पण के साथ-साथ भीतर के ममत्व को भी धीरे-धीरे शिथिल करने की बात आती है।

इस दृष्टि से पूजा का एक छोटा-सा कर्म भी बड़ा गहरा हो जाता है।

अनामिका से अर्पण करते हुए-
अनाम की ओर बढ़ना।
'मेरा' कहते हुए-
'इदं न मम' सीखना।
और वस्तु चढ़ाते हुए-
धीरे-धीरे अपने 'मैं' को भी चढ़ाना।

शायद इसीलिए आज पूजा करते समय पहली बार लगा कि हाथ की यह छोटी-सी उंगली केवल अनामिका नहीं है।

यह हमें यह भी स्मरण करा सकती है कि अध्यात्म में जितना 'मैं' पीछे छूटता जाता है, उतना ही समर्पण सहज होता जाता है।
और शायद इसी कारण, ईश्वर को अर्पित करते समय सबसे उपयुक्त उंगली वही है- जिसका अपना कोई नाम ही नहीं।

इदं न मम।

- पीयूष तिवारी , पुणे
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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