ad

तप का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि कर्मों की निर्जरा करना और आत्मा को शुद्ध करना है


तप का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि कर्मों की निर्जरा करना और आत्मा को शुद्ध करना है 

इटारसी। महावीर भवन में दशलक्षण महापर्व पर आर्यिका संघ प्रमुख भावनामति माताजी ने उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि तप का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि कर्मों की निर्जरा करना और आत्मा को शुद्ध करना है। जिस साधना से इंद्रियों और कषायों से विरक्ति बढ़े, कषाय शांत हों और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर हो, वही वास्तविक तप है।

माताजी ने कहा कि हम अक्सर तप का अर्थ केवल उपवास या भोजन का त्याग समझ लेते हैं, जबकि जैन दर्शन में तप का व्यापक और गहरा अर्थ है।

उन्होंने कहा कि केवल बाहर से उपवास कर लेना ही तप नहीं है। यदि उपवास के दौरान मन में क्रोध, मान, माया और लोभ विद्यमान हैं तो तप की वास्तविक भावना अधूरी रह जाती है। इसलिए बाह्य तप के साथ अंतरंग तप अत्यंत आवश्यक है।

आर्यिका भावनामति माताजी ने कहा कि तप ऐसा हो जिससे शरीर हल्का होने के साथ-साथ कर्मों का भार भी हल्का हो। तप केवल शरीर को सुखाने का नाम नहीं, बल्कि कषायों को सुखाने और आत्मा को निर्मल बनाने का साधन है।

वस्तु का नहीं, आसक्ति का करें त्याग

उत्तम त्याग धर्म की व्याख्या करते हुए माताजी ने कहा कि त्याग का अर्थ केवल किसी वस्तु को छोड़ देना नहीं है। जिस वस्तु के प्रति हमारे भीतर ममत्व, आसक्ति और मोह का भाव है, उस आसक्ति का त्याग करना ही वास्तविक त्याग है।

उन्होंने कहा कि वस्तु को बाहर से छोड़ देना बाहरी त्याग है, लेकिन वस्तु के प्रति मन में रहने वाले ‘यह मेरा है’ के भाव को छोड़ देना आंतरिक त्याग है। जीवन में हम धन जोड़ते हैं, मकान जोड़ते हैं, संबंध और प्रतिष्ठा जोड़ते हैं, लेकिन कभी यह भी विचार करना चाहिए कि हमने अपने भीतर से क्या छोड़ा है।

उन्होंने श्रावकों से आत्मचिंतन करने का आह्वान करते हुए कहा कि क्या हमने क्रोध छोड़ा, मान छोड़ा, माया छोड़ी, लोभ छोड़ा, ममता और अहंकार छोड़ा? यही उत्तम त्याग का वास्तविक स्वरूप है।

माताजी ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की प्रिय घड़ी टूट जाए और वह बार-बार उसे देखकर दुखी होता रहे कि मेरी घड़ी टूट गई, तो समझना चाहिए कि घड़ी हाथ से तो चली गई, लेकिन उसका मोह मन में अभी भी बना हुआ है। सच्चा त्याग तब है, जब वस्तु पास हो और फिर भी मन उससे बंधा न हो।

उन्होंने कहा कि त्याग का संबंध हाथ से कम और मन से अधिक है। वस्तु का छूट जाना मात्र त्याग नहीं, बल्कि वस्तु के प्रति मोह और आसक्ति का छूट जाना ही वास्तविक त्याग है।


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post