हिंदी कवि गोष्ठी का लंदन में
भव्य आयोजन
" नमस्ते लंदन" में बाहर लंदन था , बेसमेंट में हिंदी वाला अपना भारत
इन दिनों लंदन में शामें अक्सर धुंध, ठंडी हवा और जल्दी उतरते अंधेरे के नाम होती हैं, लेकिन कल की शाम कुछ अलग थी।
उस शाम लंदन के एक छोटे-से बेसमेंट में हिंदी ने अपना ऐसा उजाला रचा कि लगा, भाषा केवल बोली नहीं जाती, वह दूर देश में भी अपने लोगों को पहचानती, जोड़ती और अपना बना लेती है। बाहर बसवेल स्ट्रीट की सामान्य चहल-पहल थी और भीतर हिंदी के शब्दों, कविताओं, गीतों और आत्मीय मुस्कानों से सजा हुआ एक संसार। अवसर था ‘हिंदी मंजरी’, के आयोजन का जिसे आत्मीय और भव्य तरीके से Inspiring Indian Women (IIW) की ओर से रश्मि मिश्रा ने आयोजित किया था।
कार्यक्रम का स्थल भी अपने आप में इस आयोजन की कहानी कह रहा था। मध्य प्रदेश से जुड़े श्री जैन द्वारा संचालित ‘नमस्ते होलबोर्न’ का यह शुद्ध वेगन एवं वेजिटेरियन भोजनालय सामान्य सड़क पर स्थित रेस्तराँ दिखाई देता है, लेकिन उसके बेसमेंट ने उस शाम हिंदी के लिए एक आत्मीय सभागार का रूप ले लिया था।
भारत से दूर, अंग्रेजी के वैश्विक साम्राज्य के बीच, हिंदी भाषा के लिए इतना स्नेह देखकर मन सहज ही भर आया।
श्रीमती अंतरा राकेश तल्लम ने सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उन्होंने पूरे कार्यक्रम का अत्यंत रुचिकर और आत्मीय संचालन किया। उनकी अपनी रचना ‘अनकहे ख्वाबों के पन्ने’ में भी स्त्री के आत्मविश्वास और अधिकार की सुंदर अभिव्यक्ति सुनने को मिली—
“आंखों में सिर्फ काजल ही क्यों प्रिये,
आत्मविश्वास की चमक क्यों नहीं।
अधरों पे सिर्फ लाली ही क्यों प्रिये,
वाणी में अधिकारों की सुर्खियां क्यों नहीं।”
समारोह की मुख्य अतिथि अनुराधा पाण्डेय, भारतीय उच्चायोग, लंदन, ने अपने मधुर गीतों के अनेक टुकड़े सुनाकर वातावरण को सुरमय कर दिया।
गीतों के बीच हिंदी जैसे केवल साहित्य की भाषा नहीं, घर-आंगन की स्मृति, रिश्तों की गर्माहट और भारत की सांस्कृतिक धड़कन बनकर उपस्थित रही।
कविताओं और रचनाओं का सिलसिला भी खूब रंगीन रहा। विनी कालिया की पंक्तियों में सपनों के टूटने की पीड़ा थी—
“कई ख्वाब, कई किस्से जो किसी ने संजोये थे,
हर पल खूब मेहनत की लड़ियों में पिरोये थे,
ना सोचा था किसी ने कल क्या होगा कैसा होगा,
पल भर में राख हो गया
आशुतोष झुड़ेले ने बुंदेली की मिट्टी की महक समारोह की लंदन वाली फिजा में घोल दी—
“ओ री नदिया!
दूर से तीरत करत चरि आ रई,
मोरी बोली तोरे जैसी ऐ,
ओ रे कबीरा संकर की बिन्ना,
रेवा और बुंदेली सहेली ऐ,
बिल्कुल एकई जैसी ऐ!”
भाषा की यही खूबी है—वह भौगोलिक दूरी को कुछ पलों में मिटा देती है।
ऋतेश निगम, अर्ली, भोपाल से जुड़े अपने संस्मरणात्मक अंश ‘जो कहूंगा दो मिनिट में कहूंगा’ में पिता-पुत्री के रिश्ते की एक बेहद सहज और प्यारी तस्वीर लेकर आए। पिता का हर बात पर कहना—“ओके लवली”, और बेटी का झुंझलाना कि अब बड़ी हो गई हूं, “लवली मत बोला करो”, रिश्तों की उस निश्छल मिठास को व्यक्त कर गया जिसे किसी बड़े साहित्यिक अलंकार की जरूरत नहीं होती।
मैंने भी अपनी कविता ‘किशोरी लड़कियां’ की पंक्तियां साझा की
“पढ़ रही हैं फ्रेंच, जर्मन और इंग्लिश,
हिंदी की बिंदी चमचमाती ये किशोरी लड़कियां।
कल का इतिहास लिखती मुस्कराकर,
आज की ये किशोरी लड़कियां।”
लंदन में रहने वाली नई पीढ़ी के संदर्भ में ये पंक्तियां मेरे लिए विशेष अर्थ रखती हैं। भाषाएं जितनी बढ़ें, उतना अच्छा, लेकिन अपनी भाषा की बिंदी माथे पर चमकती रहे, तो बहुभाषिकता में भी अपनी पहचान का सौंदर्य बना रहता है।
इस हिंदी मंजरी आयोजन में नीतू सिंह, रुचिका राओ, देवल गुजराती, आशुतोष जी, डॉ. रूबी वर्मा, डॉ. बृजेश कुमार, चिरंजीव वर्मा, ऋतेश निगम, पीयूष श्रीवास्तव, रितु सक्सेना, विनी कालिया, ख़ुदेजा ख़ान, कमलजीत, वंदना सोमानी, नेहा तिवारी, आशीष मिश्रा और कमल जी सहित अनेक रचनाकारों और हिंदी-प्रेमियों की सक्रिय उपस्थिति रही।
अंतरा राकेश तल्लम और रश्मि मिश्रा की भूमिका आयोजन को जोड़ने और गति देने वाली रही।
सीमा और पीयूष श्रीवास्तव की ओर से व्यक्त भावनाएं इस शाम की असली उपलब्धि को बहुत सुंदर ढंग से कहती हैं। उन्होंने आयोजन को रिश्तों का अनूठा उपहार बताते हुए कहा कि देश से हजारों मील दूर समुद्र पार हिंदी की लौ को इस तरह सहेजते और उज्ज्वल करते इस खूबसूरत समूह ने उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने उनकी कहानी का अंश पाठ किया। नेहा मिश्रा ने काव्य पाठ करते हुए कहा कि "मेरा सफ़र सिर्फ मेरा है।"
सचमुच, उस शाम वहां केवल कविताएं और गीत नहीं थे, परिचय थे जो आत्मीयता में बदल रहे थे, और अपरिचित लोग थे जो कुछ ही घंटों में अपने-से लगने लगे थे।
मुझे लगा, प्रवासी जीवन में भाषा का काम केवल अपनी मातृभाषा को बचाए रखना नहीं है। भाषा लोगों के बीच पुल बनाती है। वह पीढ़ियों को जोड़ती है, स्मृतियों को सुरक्षित रखती है और परदेस में ‘हम’ की अनुभूति पैदा करती है। हिंदी की यही जीवंत शक्ति उस छोटे-से बेसमेंट में दिखाई दे रही थी।
कार्यक्रम के अंत में आभार व्यक्त करते हुए एक सुंदर संकल्प लिया गया, हर वर्ष 30 सितंबर को इसी स्थान पर हिंदी के माध्यम से रचनाकारों और हिंदी-प्रेमियों को जोड़ते हुए ‘हिंदी मंजरी’ का आयोजन किया जाएगा।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव
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साहित्यिक समाचार
