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लघुकथा : उम्मीद - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल



लघुकथा : 

उम्मीद

“माँ, हर बात पर ‘ठीक है’ क्यों?”
“तो क्या कहूँ?”
“पहले तो टोकती थीं।”
“तब लगता था, कोई सुनेगा।”
“अब हम नहीं सुनते?”
माँ मुस्कुराई।
“सुनते हो… मानते अपने मन की हो।”
बेटा चुप हो गया।
“कल दवा लेने को कहा था।”
“काम था, भूल गया।”
“पिछले हफ्ते डॉक्टर के पास?”
“मीटिंग थी।”
“और रविवार?”
“दोस्त आ गए थे।”
“तो आपने कहा क्यों नहीं?”
“कहा था।”
“दोबारा कह देतीं।”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“कितनी बार?”
बेटे के होंठ रुक गए।
“आप नाराज़ हैं?”
“नहीं।”
“दुखी?”
“शायद वह भी नहीं।”
“फिर इतनी चुप क्यों?”
माँ ने चाय की प्याली उठाई।
“जब शिकायत बार-बार लौटकर अपने पास ही आए, तो आदमी उसे कहना छोड़ देता है।”
“और मुस्कुराना सीख जाता है?”
“हाँ… सामने वाले को आसानी रहती है।”
बेटे ने मोबाइल मेज़ पर रख दिया।
“माँ, डॉक्टर के पास कब चलना है?”
“अब रहने दो।”
“क्यों?”
माँ खिड़की की ओर देखने लगी।
“कुछ नहीं… मैं ठीक हूँ।”
बेटे ने पहली बार महसूस किया—
माँ का *‘मैं ठीक हूँ’* शायद उसकी सबसे बड़ी शिकायत थी।

- डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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