जनता को जानने का अधिकार है
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दो बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं, जिनकी तरफ मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ l पहला इलेक्टोरल बॉण्ड को असंवैधानिक घोषित करना, दूसरा चंडीगढ़ मेयर चुनाव पर निर्णय l दोनों ही निर्णय ऐसे समय पर आए हैं, जब देश में आम चुनाव होने वाले हैं। दोनों ही निर्णय सीधे-सीधे लोकतांत्रिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं, लेकिन आज मैं केवल इलेक्टोरल बॉण्ड पर बात करुँगा l
इलेक्टोरल बॉण्ड प्रणाली को 2017 में तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा यह कह कर लाया गया था, कि इस प्रणाली से काले धन पर रोक लगेगी और राजनीतिक पार्टियों को दान देने में पारदर्शिता आएगी। इसे 2018 में लागू कर दिया गया l इस प्रणाली के माध्यम से कोई भी व्यक्ति या संस्था एसबीआई बैंक की कुछ निश्चित शाखाओं से एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ (कुल पाँच कैटेगरी) के एक या अधिक इलेक्टोरल बॉण्ड खरीद सकता है और जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 29(A) में पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों, जिसे पिछले आम चुनाव या विधानसभा चुनाव में कम से कम 1% वोट मिले हो, को दे सकता है। तत्पश्चात् पार्टी को इसे बैंक में जाकर 15 दिनों के अंदर कैश कराना होता है और कैश पार्टी के अधिकृत बैंक खाते में जमा हो जाता है l इस पूरी प्रक्रिया में व्यक्ति या संस्था का नाम कहीं नहीं आता है, अर्थात् पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता है। जिसके कारण पारदर्शिता पर सवाल उठना जाहिर था l साथ ही साथ इलेक्टोरल बॉण्ड प्रणाली को सूचना के अधिकार अधिनियम से भी बाहर रखा गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के माध्यम से भी पता नहीं कर सकता कि किस व्यक्ति या संस्था (मुख्यतः बड़े औद्योगिक घराने ) ने किस पार्टी की कितना दान दिया है l
इस प्रणाली के खिलाफ चार याचिकाएँ आयीं, जिनमें मुख्य याचिकाकर्ता एसोसियशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(ADR), कांग्रेस नेता जय ठाकुर और CPM थे l इन याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चुनावी बॉण्ड के माध्यम से दिए गए दान की जानकारी होना मतदाताओं का अधिकार है और लोकतंत्र में ऐसा होना जरूरी भी है l
इस पर सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ (मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ भी) ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉण्ड को यह कहते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया कि यह प्रणाली सूचना के अधिकार का उल्लंघन है। मतदाताओं को दान में दी गई राशि को जानने का पूरा अधिकार है l कॉरपोरेट घरानों द्वारा दिए जाने वाले मोटे दान के बदले में अपने पक्ष में नीतियाँ बनवाने की चाह होती है, जो वास्तव में आम मतदाताओं के साथ अन्याय है l इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई से 2018 से अब तक का पूरा ब्यौरा चुनाव आयोग को देने को कहा है और चुनाव आयोग से दानदाताओं की पूरी सूची 13 मार्च तक आयोग के साइट पर अपलोड करने को कहा है l
वास्तव में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्वागत योग्य है और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है l
आलोक शाक्य
बदायूँ, उत्तरप्रदेश
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