लघुकथा : भरपाई
"देव तुम भी न! देखो फिर जली हुई है बैड शीट..."
"अच्छा,तुमको डॉ. श्रीलाल याद हैं न? अरे ! वही जिला अस्पताल के भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी।
जो चैरिटी (धर्मार्थ कार्यों )के लिए शहर भर में मशहूर थे ।
चेन स्मोकर थे ,पर मजाल है जो उनको किसी ने क्लीनिक में सिगरेट पीते हुए देखा हो ।
या तो उठकर बाहर चले जाते थे या वॉशरूम।"
मृणाली स्नेह पूर्ण शब्दों में कहती चली जा रही थी।
"तो,यहाँ क्या परिपेक्ष्य है इसका!"
देव ने उखड़ते स्वर में पूछा।
"तुम भी क्यों नहीं ऐसा करते?"
"बालकनी में भी तो जा सकते हो !"
"या फिर पार्क में..."
"और नहीं तो सोफे पर भी तो बैठा जा सकता है ।"
"जली हुई चादरें क्या ठीक लगती हैं ?"
उसने देव का हाथ थामते हुए कहा ।
देव मौन ही रहकर फिर से मूवी देखने में व्यस्त और मस्त हो गये ।आज रविवार जो था ।
मृणाली भी रसोई की ओर मुड़ गयी।
लगभग दो घंटे बाद डोर बेल बजी तो मृणाली ने खिड़की से झांँका।
"मैम कुरियर"
बाहर से आवाज़ आई।
" मैंने तो कुछ नहीं मँगाया!
"तुमने कुछ ऑर्डर किया था देव?"
"हाँ,पैकेज है, ले लो।" देव ने सपाट शब्दों में कहा
मृणाली ने उत्सुकतावश पैकेज खोला तो हलके आसमानी और उसके पसंदीदा सफेद रंग की सिल्क की छुअन उसके हाथों को बहुत भली लगी।
आसमानी रंग पर सफ़ेद फूल
मानों आसमान में बगुले उड़ रहे हो।
सफ़ेद रंग पर महाराष्ट्र और राजस्थान गलबहैया डाले हुए थे,यानी वर्ली और सांगानेरी प्रिंट एक साथ ।
इतना भारी भरकम आखिर क्या हो सकता है ?
जैसे -जैसे परतें खुलती गयी मृणाली के मन में गांठें पड़ने लगी ...
पानी की गांठें , अचानक चादरों में नागफनी उग आई जो उसको भीतर तक सालती चली गयी और पानी वाली गांठें घुलकर उसी घड़ी आँखों के रास्ते बह चली ।
"तो चादर मँगायी हैं देव ने!"
"ये क्या बात हुई?"
"तो मेरी हाथ कढ़ाई का हर्ज़ाना भरा जा रहा !और मन जो छलनी हुआ है ,उसका क्या ? "
"वस्तुओं की कीमत चुकाई जा सकती है,पर भावनाओं की नहीं।'
"मनुष्य का वश चलता तो अपनी मृत्यु का भी हर्ज़ाना माँग लेता प्रकृति से।"
लाखों लोग भूखे - प्यासे हैं,दर - दर भटक रहे हैं ।
सात राज्यों में बाढ़ से त्राहि - त्राहि मची है वो किससे हर्ज़ाना माँगे? वो कहाँ जाए उनको मालूम है कि बाढ़ को आना ही है ,हर साल आना है पर वो डटे हुए हैं जीवन को फिर से शुरु करने के लिए ।
उसने ऊसांस भरी और आँसू पोंछकर उठ खड़ी हुई ...
- सुमन सिंह चन्देल,मुजफ्फरनगर
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