काव्य :
राजमुकुट हिन्दी के माथे
कोस कोस पर पानी बदले
चार कोस पर जब वाणी,
है उदार उर्वर विशाल
भारत की संस्कृति कल्याणी!
बाइस भाषाओं को करता
संविधान है सम्मानित,
राजमुकुट हिन्दी के माथे
राजदंड है कर धारित।
रग-रग हिंदी बहती जैसे
नस-नस बहे रक्त धारा
शत-शत नमन तुम्हें, लहराए
विजय पताका जग सारा ।
- डॉ. सुधा कुमारी , नई दिल्ली
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