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पितृ पक्ष का महत्व:-कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, लखनऊ


 

पितृ पक्ष का महत्व


पंचैव पूजयन लोके,

यश: प्राप्नोति केवलम।

देवान पितृन मनुश्याश्च,

भिक्षून अतिथि पंचमान।


पितर, देवता,अतिथिगण,

ये पूजनीय कहलाते हैं,

सारे मनुष्य व याचक भी,

इनकी श्रेणी में आते हैं।


धर्म सनातन यह कहता है,

इन पाँचो की पूजा करिये,

सच्चे मन से स्तुति करके,

इन सबकी सेवा करिये।


आचरण जो ऐसा करते हैं,

सम्मान तथा यश पाते हैं,

ईश्वर भी इन पर कृपा करे,

जो यश देकर यश पाते हैं।

अर्थात् - हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति  के अनुसार प्रत्येक प्राणी को देवता, पितर, मनुष्य, याचना करने वाले तथा अतिथि, इन पाँचों की सदैव सच्चे मन से अपने सामर्थ्य के अनुसार पूजा - स्तुति व सेवा करनी चाहिए । इससे जीवन में यश और सम्मान प्राप्त होता है और भगवान प्रसन्न होकर सभी कार्य सफल करवा देते हैं।

“अतिथि देवो भव, मातृ-पितृ देवो भव”

पितृ पक्ष श्राद्ध 2024:

पितृ पक्ष श्राद्ध हर साल आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होता है और अमावस्या तिथि तक रहता है। पितृ पक्ष श्राद्ध को शास्त्रों में पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने का समय बताया गया है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि यमराज भी इन दिनों पितरों की आत्मा को मुक्त कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों के बीच 15 दिनों तक रह कर श्राद्ध का अन्न जल ग्रहण कर तृप्त हो सकें। इस साल आश्विन कृष्ण पक्ष का आरंभ 18 सितंबर को हो रहा है। इसलिए 18 सितंबर से ही पितृपक्ष श्राद्ध का आरंभ हो जाएगा। लेकिन शास्त्रों में एक अन्य नियम भी पितृपक्ष के संदर्भ में बताया गया है जिससे पितृ पूजन का आरंभ 17 सितंबर भाद्रपद पूर्णिमा से ही हो जाएगा।

*किसके सम्‍मान के लिए होता है भाद्र पूर्णिमा का श्राद्ध:*

17 सितंबर को भाद्र पूर्णिमा तिथि है। इस दिन सबसे पहला तर्पण किया जाएगा। इस पूर्णिमा तिथि को ऋषि तर्पण तिथि भी कहा जाता है। इस दिन मंत्रदृष्टा ऋषि मुनि अगस्त का तर्पण किया जाता है। दरअसल इन्होंने ऋषियों और मनुष्यों की रक्षा के लिए एक बार समुद्र को पी लिया था और दो असुरों को खा गए थे। इसलिए सम्मान के तौर पर भाद्र पूर्णिमा के दिन अगस्त मुनि का तर्पण करके पितृ पक्ष का आरंभ होता है।

*पितृ पक्ष का महत्व:*

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का खास महत्‍व होता है। मृत्‍यु के बाद भी हिंदू धर्म में पूर्वजों का समय-समय पर स्‍मरण किया जाता है और श्राद्ध पक्ष उन्‍हीं के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करने और उनके निमित्‍त दान करने का पर्व है। मान्‍यता है कि यदि श्राद्ध न किया जाए तो मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है।माना जाता है कि पितृपक्ष में पितरों के निमित्‍त दान-पुण्‍य करने से हमारी कुंडली से पितृ दोष का दुष्‍प्रभाव समाप्‍त होता है।

*श्राद्ध पक्ष की प्रमुख तिथियां:*

*पूर्णिमा श्राद्ध - 17 सितंबर से

शुरू होकर अंतिम श्राद्ध 

प्रतिपदा श्राद्ध - 18 सितंबर 

पितृ अमावस्‍या का श्राद्ध : 02 अक्तूबर समाप्ति यानी पितृविसर्जन होगा।

*जब याद ना हो श्राद्ध की तिथि:*

पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है।शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।

*क्या है पौराणिक कथा:*

कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध में दानवीर कर्ण का निधन हो गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई, तो उन्हें नियमित भोजन की बजाय खाने के लिए सोना और गहने दिए गए। इस बात से निराश होकर कर्ण की आत्मा ने इंद्र देव से इसका कारण पूछा। तब इंद्र ने कर्ण को बताया कि आपने अपने पूरे जीवन में सोने के आभूषणों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को नहीं दिया। तब कर्ण ने उत्तर दिया कि वह अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानता है और उसे सुनने के बाद, भगवान इंद्र ने उसे 15 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके। इसी 15 दिन की अवधि को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है।

पितृपक्ष में श्राद्ध, पिंडदान एवं तर्पण*: - 

पितृपक्ष में अपने पिता की मृत्युतिथि पर श्राद्ध, पिंड दान व तर्पण करना शास्त्रों के अनुसार अत्यंत  आवश्यक है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है, इसलिए यह संस्कार श्रद्धा के साथ करना चाहिए। जो लोग सभी श्राद्ध,  पिंडदान व तर्पण न कर सकें उन्हें कम से कम अपने पिता की मृत्यु तिथि पर पितृपक्ष में अवश्य यह संस्कार करना चाहिये। महर्षि जाबालि ने लिखा है कि श्राद्ध करने से पुत्र, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और अभिलाषित वस्तुओं की प्राप्ति होती है।

 “पुत्रणयुस्तथारोग्यमै

ऐश्वर्यमतुलं तथा,

प्राप्नोति पंचमां कृत्वा श्राद्धन कामान्श्चपुसक्लान्न।”

पितृपक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक रहता है। जिनके पिता की मृत्यु पूणिमा को हुई है वे पूर्णिमा को ही श्राद्ध करते हैं। अन्य लोगो द्वारा पितरों का श्राद्ध पिता की मृत्यु तिथि के अनुसार प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक किया जाता है। इसमें पिता, पितामह (दादा) एवं  प्रपितामह (परदादा) को सपत्नीक (यदि उनकी पत्नी का भी स्वर्गवास हो चुका है ) पिंडदान किया जाता है। अर्थात माता, दादी व परदादी का श्राद्ध भी उसी समय किया जाता है। एवं उसी के साथ मातामह (नाना) प्रमातामह (परनाना) वृद्धप्रमातामह (वृद्ध परनाना) नानी, परनानी व वृद्ध परनानी सहित छः पिंडदान किये जाते हैं। पिंडदान के बाद कम से कम नौ या 11 ब्राह्मणों को विधिवत भोजन कराया जाना चाहिए। अगर 11 ब्राह्मण को न करवा सकें तो 9, 7, 5 या तीन ब्राह्मनो को भोजन करवायें। यदि अच्छे ब्राह्मण न मिलें तो कम से कम एक सात्विक ब्राह्मण को अवश्य भोजन कराना चाहिए, अथवा उपरोक्त के समतुल्य भोज्य पदार्थ दान करना चाहिए एवं मृत व्यक्ति के उद्देश्य से उसके पसंद की चीजों का दान करना चाहिए यथा वस्त्र आदि। इसके साथ ही अन्य गरीबों को भी यथा शक्ति दान करना चाहिये।

शास्त्रों में पित्रपक्ष में मातृ नवमी करने का भी विधान है, जिसके अनुसार बहुयें अपनी सासु माँ के लिए श्राद्ध करती हैं। वंश में किसी भी सौभाग्यवती मृत स्त्री के लिए मातृनवमी को श्राद्ध किये जाने का नियम है, इसके लिए प्रथा यह है की बहुयें जिस दिन से पितृपक्ष लगता है उसी दिन से घर के अंदर आँगन में पितृ स्थान को मिटटी से लीप कर एक वेदी बनाती हैं, उस पर एक दातून एक लोटा पानी कुछ फ़ूल चावल और तिल रखती हैं। यह प्रक्रिया नवमी तक चलती है, नवमी के दिन अच्छे -अच्छे पकवान बनाकर वहां अर्पित करे, फिर यथाशक्ति भोजन इत्यादि दान कर ही स्वयं भोजन करती है। यह मातृनवमी इस वर्ष 25 सितम्बर 2024 बुधवार को है । सौभाग्य की इच्छा रखने वाली हर बहू को मातृनवमी का विधिवत श्राद्ध करना चाहिए।

 - कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, लखनऊ 

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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