दीपोत्सव (कहानी) :
खिलते दिये
घना अंधेरा पेडों के सायों को और विकराल रूप दे रहा था। कच्चा रास्ता बस के पहियों को उडा रहा था, बस के हिचकोलों से नींद में डूबे यात्री लुढक रहें थे। रूक्मिणी थकान से चूरचूर हिचकोले लेती बस में अपने आप को सम्हाल रही थी। बस को भी जैसे सुस्ती चढ़ गई थी। नदी पर बने पूल पर आते ही बस खड़खड़ाहट करती धीमी हो गई। नदी का पानी भी शोर मचा रहा था। तभी कडंक्टर यात्रियों को आवाज देने लगा, “सिद्धेश्वर आ गया” रूक्मिणी अपनी बैग उठाकर, शाल को ठीक करने लगी।वह अपनी जन्मभूमि के इस रास्ते से अच्छी तरह से परिचित थी,अभी बस स्टाप आने में काफी देर है। उसको फिर से सुस्ती और नींद आने लगी। जोर से हार्न बजाकर ड्राइवर ने बस रोक दी। वह नींद को तोड़कर उठ खड़ी हो गई।
हड़बड़ाहट में सब उतरने लगे। बाहर अब अंधेरा छंटने लगा था। हवा में ठंडक भर गई थी। रूक्मिणी ने देखा अपना छोटासा गाँव दीपावली के स्वागत में सजधज गया था।कहींकहीं टिमटिमाते बिजली के रंगीन बल्बों से खिल उठा था। इस रोशनी में डूबी गलियों से वह तेजी से चलकर अगली गली में अपने घर के पास चली गई।
उसने धीमे से दरवाजा खटखटाया। नींद में डूबे भाई ने दरवाजा खोला। “दीदी, आ गई। चलो आ जाओ। मैं तो सो रहा हूँ”
रूक्मिणी जानती थी, सब को जगाना ठीक नही है। वह वही बाहर के कमरे में सोफे पर लेट गई। अब थोड़ी देर में सब जाग जायेंगे आज वसु बारस है।
दीपावली का गंध घर भर में महक रहा था। घर में बनी मिठाई, आंगन में खिले फूल, खेतों से आया नया अनाज। मेहनतकश मजदूरों- किसानों का, मेहनत की कमाई का दीपोत्सव। धरती, नदियाँ, घर,मंदिरों, गोधन के प्रति कृतज्ञता का दीपोत्सव।
मां ने उसको हल्के से जगाया। रूक्मिणी उठकर तैयार हो गई। मां ने आरती की थाली तैयार कर दी थी। भैय्या और मामाजी भी तैयार थे। नीचे पशुओं का आवास था। मां के साथ रूक्मिणी आरती की थाली लेकर गई। भैया और मामाजी हर पशु के सिंग पकड़ कर रखते थे, सबको टीका लगाकर रूक्मिणी आरती उतारने लगी। तब तक पडोस का जीवन भी अपना छोटा गाय का बछड़ा और कुत्ता लेकर आ गया। “दीदी, इनको भी आरती करो ना”
रूक्मिणी को लगा ये मुझे चिढाने ही आया है। वह तुनककर बोली,“बछड़े का ठीक है, यह दूसरा क्यों लाया?”
जीवन मासूमियत से बोला, “दीदी वह नाराज हो जायेगा”
अब तो सब हंसने लगे। जीवन बछड़े को लेकर सामने आया। बछड़े को टीका लगाते हुए रूक्मिणी हंसकर बोली, “सचमुच तू बड़ा ही नटखट है”
मां ने भी जीवन को प्यार से थपकी देते हुए कहा, “चलो बेटे, नाश्ता करने”
भैया और मामाजी सब पशुओं को हरा चारा खिलाने लगे। जीवन भी उनको मदद करने लगा।
नाश्ते की मीठी खुशबू से घर महक रहा था। दीपोत्सव की शुरूआत जो हो गई थी।
- लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)



संपादक,
ReplyDeleteश्री. देवेंद्र सोनी जी,
कहानी प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!