काव्य :
किसने देखा कल
दुख के बादल,जब, छाये हों
और ,दिखता ,बहुत अंधेरा हो
तूँ ,आस की बाती ,थामे रख
उजियारा, हो ही जावेगा
जीवन के रस्ते ,कहाँ सुगम
कुछ सरल यहाँ ,कुछ हैं दुर्गम
तूँ पथिक, चला चल ,हो निर्भय
मन्जिल पर, तूँ ही पहुंचेगा
जीवन ,प्रतिदिन ,तूँ ,जी ता चल
सन्नाटे,चीर, मचा हल चल ,
करुणा से ,जीवन ,कर सार्थक
कर परहित,ब्रज,किसने देखा , कल
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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