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काव्य : वो दो वचन - मिष्टी गोस्वामी ,दिल्ली


 काव्य : 

वो दो वचन


सुनो

मुझे पता था 

जब माँ ने भरत को 

राजगद्दी दिलाने के लिए वचन मांगा

जानती थी,नहीं मानेंगे भरत 

माँ शायद अपने ही जाय पुत्र को इतना नहीं समझ पाई,

या समझना नहीं चाहा किसी परिस्थिति वश

लेकिन मेरा क्या?

मैं तो ना इधर की रही न उधर की। 

सीता चली  गईं पति धर्म निभाने

उर्मिला रह गई पति के बिना

और मैं --- ??

मुझे जानने की चेष्टा ही नहीं की किसीने

न पति के साथ न पति के बिना !!

उन्हें जाना था चले गए

अयोध्या के बाहर नन्दी ग्राम में पूरे चौदह वर्ष के लिए

मेरे जीवन में भर दिया

मौन का अमिट रंग

कितना मुश्किल होता है ना

किसी से कोई उम्मीद भी नहीं

कोई निराशा भी नहीं

लेकिन क्या

मां ने तनिक भी

सोचा होगा 

सच में इतना कुछ घटित होगा

प्रतिदिन आते थे वे राजमहल

और मैं देखती थी उन्हें

वो जो एक भाई के भाई थे ।

मेरे पति उसमें कहीं नहीं थे

यदि होते तो क्या मेरे दुख

मेरी पीड़ा और मेरे अकेलेपन का 

रत्ती मात्र भी एहसास ना करते

ना प्रेम के प्रत्युत्तर में प्रेम पाने की उम्मीद

ना किसी का सबकुछ छिन जाने का ग़म

भर दिया

एक अपरिभाषित रंग 

मौन का रंग

मुझसे कभी नहीं पूछा

मेरी किसी

भावनात्मक  मानसिक या 

और किसी आवश्यकता के बारे में ।।

मेरे सुखों का सागर मेरे सामने था

प्रति दिन, और मैं

प्यासी ही रह गई ।

हाशिये पर खड़े रह कर

मैंने गुज़ारा अपना पूरा यौवन-

मैं अवांछनीय सी

तकती रही सूर्य उदय और अस्त को 

चौदह वर्ष तक

क्या सच में वनवास 

किसी एक का था?


 - मिष्टी गोस्वामी ,दिल्ली

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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