काव्य :
कैसे मनाऊँ दशहरा
मेरा मन-रावण नहीं मरा
कैसे मनाऊं दशहरा
काम,क्रोध जीवन के अंग
मद,मोह ना होते भंग
आचरण बेलगाम होता
मन देता है नहिँ पहरा
मेरा रावण नहीं मरा....
जीवन जीता जाऊं मैं
सभी लाभ ही पाऊँ मै
लोभ ये मुझमे है भरा
और भरी है मत्सरा(ईर्ष्या)
मेरा रावण नहीं मरा...
परहित और परमार्थ कहाँ
केवल मुझमे स्वार्थ यहां
क्रूर मै मद में चूर मानव
अन्याय व मुझमें अहंकार भरा
ब्रज,मेरा रावण नहीं मरा...
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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