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काव्य हां मैं रावण हूं - प्रमोद सामंतराय सरायपाली


 

काव्य

 हां मैं रावण हूं


हां मैं रावण हूं पर 

मर्यादा में रहना जानता हूं, 

माता को माता, बेटी को 

बेटी की तरह मानता हूं।


मानता हूं कि मैंने माता 

सीता का हरण किया था, 

फिर भी पूजा में मुझे श्रीराम ने  

पंडित रूप में वरण किया‌ था।


आज तो गली-गली और 

घर-घर में रावण पाओगे,

किसी अबला को पाकर अकेले 

तुम खुद ही रावण बन जाओगे। 


जो मन के रावण को ना मार सके 

तुम मुझे मार क्या पाओगे,

फिर भी मरने को हूं मैं तैयार  

क्या 'राम' कभी तुम बन पाओगे।


एक पुतला जलाकर कहते हो तुम 

कि हमने मार दिया है रावण को, 

क्या नारी, बेटी यहां है सुरक्षित 

क्या मार सके तुम दूषित मन को।


खुश ना हो तुम एक पुतला जलाकर 

अगले साल मैं फिर खड़ा हो जाऊंगा, 

आज तुमने दहन किया जिस पुतले को 

अगले साल उससे भी बड़ा हो जाऊंगा।


जिस दिन नारी बेखौफ घूमेगी सड़कों पर 

जिस दिन सब ओर होगा भाईचारा, 

जब गिर जाएंगे नफरत के दीवार सभी 

तब खुशहाल होगा यह देश हमारा। 


सही मायने में होगा तब रावण दहन 

खुशियां ही खुशियां होंगी पुलकित होगा सबका मन,

हां मैं रावण हूं पर 

अब नहीं चाहता कुछ और 

खत्म कर दो अपने भीतर का रावण 

खुशियां ही खुशियां होंगी चहुं ओर।


  - प्रमोद सामंतराय

सरायपाली महासमुंद (छ.ग.)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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