दृष्टिकोण :
संकुचन और प्रसारण
बड़ी विचित्र स्थिति है। आज आदमी घर में बैठा विश्व शांति के बारे में सोचता है जबकि घर में अपने सगे भाई से बोलचाल तक नहीं रहती, रहती भी है तो दुश्मनों जैसी। विचार क्षमता से परे एक शब्द सोच पैदा हो गया है और तुम्हारी सोच, मेरी सोच ने जगह ले ली है। और विचार इन्हीं के इर्द-गिर्द विचार घूमता रहता है। आध्यात्मिक विचारवान कहते हैं विचार आते जाते हैं उन पर ध्यान मत दो बस उन्हें देखो। और सामाजिक विचारवान विचार करने को कहते हैं।
वैसे विचार की पैदाइश में राग द्वेष के अतिरिक्त ईर्ष्या का भी बड़ा हाथ है। एक आदमी अध्ययन करके या पर्यटन द्वारा देश विदेश की स्थिति देखकर लिखता है क्योंकि कहीं उसे कचोट होती है। अपनी कचोट को अभिव्यक्त कर भीतर से शांत होना चाहता है। और दूसरा उसके लेखन को पढ़कर घर बैठे ही उस अनुभूत कचोट से ऊपर लिखना चाहता है क्योंकि ईर्ष्या उसे विवश कर देती है। थोड़ा लिखकर वह ईर्ष्या से निजात पाता है। बड़ी शांति मिलती है।
दृष्टिकोण बनने के पीछे कई घटक काम करते हैं। सबसे पहले तो बचपन में परिवार का माहौल होता है। परिवार में यदि प्यार भरा व्यवहार रहता है तो मन में संसार के लिए भी प्यार व विश्वास रहता है और यदि क्लेश बना रहता है तो पूरा संसार अविश्वसनीय, नफ़रत भरा और खतरनाक महसूस होता है। इसके बाद स्कूल कॉलेज का वातावरण भी दृष्टिकोण बनने में बहुत बड़े घटक साबित होते हैं। वहाँ के मित्र, प्रतिस्पर्धी, विषय के पाठ्यक्रम व शिक्षक आदि बहुत कुछ दे जाते हैं जिससे दृष्टिकोण बनने में मदद मिलती है। आर्थिक परिस्थितियों का तो बहुत बड़ा योगदान रहता है। दृष्टिकोण कब कैसा बन जाता है इसका एहसास मनुष्य को हो ही नहीं पाता। अध्ययन और स्वाध्याय अपने दृष्टिकोण को परखने का रास्ता बनाते हैं और कई लोगों का दृष्टिकोण बदल भी जाता है। पर यह काफी हद तक सत्य है कि एक बार जो दृष्टिकोण बन जाता है उससे हटकर सोचना बड़ा मुश्किल होता है।
और दृष्टिकोण ही सकारात्मक व नकारात्मक सोच पैदा करता है। इसीसे पंथ व संप्रदाय बन जाते हैं। किसी को पसंद करना या नापसंद करना इसी दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। किसी को पसंद करने का हमारे पास कोई ठोस कारण नहीं है पर करते हैं और जिसे पसंद करते हैं उसके हर कृत्य, कथन हमें अच्छे लगते हैं। यहाँ तक अच्छे लगते हैं कि हम चाहते हैं कि और लोग भी पसंद करें और जो नहीं करते उन पर हमें क्रोध आ जाता है जबकि पसंद आने वाले से हमारा कोई सीधा सरोकार नहीं होता। इसी प्रकार जिसे पसंद नहीं करते तो उसके हर काम व बात अच्छी नहीं लगती और संदेह से देखते हैं। उसकी किसी बात पर विश्वास नहीं होता। अविश्वास का कोई सीधा कारण प्रत्यक्ष नहीं है पर विश्वास नहीं होता।कोई यह नहीं सोचता कि मेरा दृष्टिकोण ऐसा क्यों है?
दृष्टिकोण निर्माण में पूर्वाग्रह का भी बड़ा योगदान है। सामने घटने वाली घटना के बारे में हर व्यक्ति की अलग राय होती है। कुछ राजनीति को तो कुछ व्यवस्था को तो कुछ समाज को दोष देने लगते हैं। अपने अपने पूर्वाग्रहों से सोचते हैं। वस्तुस्थिति व सत्य के लिए किसी पूर्वाग्रह की जरूरत नहीं है और किसी तथाकथित नियम की। अपने माहौल से सीखते हुए पूर्वाग्रह रहित विचार करने से व्यक्ति का दृष्टिकोण स्पष्ट रहता है और वह किसी भी स्थिति परिस्थिति में न्याय कर सकता है। इसलिए दृष्टिकोण के संकुचन व प्रसारण से मुक्त रहने का प्रयास एक सार्थक दृष्टिकोण बनाए रख सकता है। सच्चाई व ईमानदारी हर समय हर जगह अपना महत्व रकती हैं, यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
- डॉ. सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र
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दृष्टिकोण पर अच्छा विश्लेषण किया गया है। अनुभव सबसे बड़ा गुरु होता है। सच्चाई को समझकर अनदेखा करना गुनाह होता है।
ReplyDeleteसत्संग का जीवन में बहुत लाभ होता है। साधुवाद🙏
लतिका