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व्यंग्य लेख : रावण के पुतले की शर्त - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल


 

व्यंग्य लेख :

रावण के पुतले की शर्त

- विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल 


       विजयादशमी की शाम थी,  बस्ती बस्ती दशहरा मैदान , रामलीला ग्राउंड, स्टेडियम जैसे मैदानों में रावण , कुंभकरण, मेघनाथ के ऊंचे से ऊंचे पुतले खड़े थे । हर ऐसे तमाशे में बिना बुलाए भीड़ जुट ही जाती है। बच्चे गुब्बारों के लिए पिता से जिद कर रहे थे , चाट के ठेले के गिर्द महिलाओं की भीड़ थी ।   चाट वाला चुनावी बजट में वित्त मंत्री के प्रलोभन भरी घोषणाओं  जैसी  फुलकियां बांट रहा था। आसमान में बादल छाए थे और रामलीला मैदान में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले हेकड़ी और अकड़ के साथ खड़े थे। ज्यों ही मुख्य अतिथि ने रावण दहन की कोशिश की कहीं तेज बारिश ने उत्सव को भीगो दिया , तो कहीं हवा ने मंच उड़ा दिए लोग हैरान थे  दियासलाई की तीलियां जल नहीं रही थी । किसी न किसी कारण से रावण जलने का नाम ही नहीं ले रहा था।

परेशान आयोजकों ने रावण को निहारा तो 

 रावण के पुतले से आवाज आई "मैं तो जलने को तैयार हूँ, हर साल जला तो लेते ही हो मुझे,  पर इस बार मेरी एक छोटी सी शर्त है । 

वह क्या? आयोजक पूछ बैठा । 

रावण ने कहा मुझे तो स्वयं श्रीराम विद्वान मान चुके हैं, पता है न । 

हां तो , आयोजक बोले । 

मेरी शर्त यह है कि मुझमें आग वही लगाए जिसमें राम की सी मर्यादा का अंश तो हो!" 

मेघनाथ का पुतला झनझनाया "हाँ, हमें जलाना है तो लक्ष्मण-सा कोई लक्षण तो दिखे जलाने वाले में!"

यह सुनकर मैदान में हलचल मच गई। एक नेता जी आगे बढ़े, जो हमेशा धर्म की बात करते थे। उन्होंने माचिस उठाई, रावण हँसा  "अरे नेता जी, आपके भाषणों भर में राम हैं पर स्वयं तय कर लें यदि आपके काम में भी राम हो तो ही तीली जलाना ।

वरना आग लगते ही मैं  तुम पर गिर पड़ूंगा और मेरे पुतले की सारी आतिश बाजी तुम्हें समेट लेगी , नेताजी बगलें झांकते खिसक लिए ।  एक बड़ा कारोबारी सामने आया, उसने पुतले पर नोट उड़ाते हुए , आग लगाने की कोशिश की तो भी पुतला नहीं जला , नोटो के बंडल जरूर जल गए । रावण बोला अपने  हर काम रुपए की ताकत से करवाने वाले अभिमानी  सेठ,  मैं तो कुबेर से उसका पुष्पक विमान छीन चुका हूं, तुम क्या मुझे काले रुपयों से आग लगाने की कोशिश कर रहे हो।

   सारा दिन सोशल मीडिया पर धार्मिक पोस्ट करने वाला एक जेन जी पीढ़ी का नौजवान आगे बढ़कर रावण दहन को उद्यत हुआ पर उसकी माचिस भी काम नहीं आई, कुंभकरण उबासी लेते हुए बोला  "तुम तो मुझसे भी बडे सोने वाले निकले , नौजवान तुम सोशल मीडिया के सपनों की गहरी नींद सो रहे हो । 

तुम कुंभकरण सरकारों  को  आग लगाकर जगाना चाहते हो , असंभव है।

आयोजक गिड़गिड़ाए हे रावण आप तो  असाधारण विद्वान हैं, स्वयं भगवान राम आपकी विद्वता का लोहा मानते हैं, हम निरीह आयोजक हैं जो साल दर साल राम लीला दोहराते हैं, हमारी लाज अब आपके हाथ है, आप साल दर साल जलते आए हैं, आप ही बताइए आप कैसे जलेंगे ? 

 रावण की आवाज गूँजी  "आह , दिन पर दिन बुराइयों के लंबे , रंगीन रावण के पुतले तो बना लेते ही , पर अपने अंदर के अहंकार के रावण को पनपने देते हो। बिजली की चकाचौंध और आतिशबाजी में तो लाखों रुपए उड़ा देते हैं, पर पड़ोसी की मदद के लिए समय नहीं निकाल पाते। विजयादशमी का असली अर्थ है बुराइयों पर विजय!  अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को नहीं जलाओ, पुतले वाले बाहरी रावण का दहन तो सहज रस्म मात्र है। वास्तविक विजय तो तब होगी जब राम हमारे व्यवहार में दिखेंगे, सिर्फ मुखौटों में नहीं। नीलकंठ के दर्शन की दार्शनिकता समझो । जब लक्ष्मण का संयम और समर्पण हमारे व्यवहार में झलकेगा , मर्यादा हमारे चरित्र का हिस्सा बनेगी, तभी रावण दहन सार्थक होगा ।  विजयादशमी का पर्व  ऐसा तमाशा बनकर न रह जाए जहाँ रावण जलने से पहले हमारी नैतिकता जलती नजर आती है। आखिर आयोजकों ने प्रतिकूल मौसम के बावजूद किसी तरह कपूर आदि तेज ज्वलनशील पदार्थों से किसी तरह रावण दहन कर ही डाला , एक और साल सार्वजनिक रामलीला पूरी हुई । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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