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कहानी : एक दूजे के लिए - डॉ मंजू लता , नोयेडा


 कहानी :

          एक दूजे के लिए 

          

             उससे मिलना महज़ एक इत्तफाक था या फ़िर ईश्वर का कोई खास ईरादा। वो कौन थी जिस पर जा कर हर रोज़ मेरी नज़र टिक जाती थी और हटने का नाम नहीं लेती थी। न जाने कौन सी चुंबकीय शक्ति की धारणी थी, जो अपनी ओर मुझे खींचे जाती थी। हर रोज़ वह मुझे मेट्रो स्टेशन पर मिल जाया करती थी। कई मेट्रो सामने से गुजर जाती थी, खींचा हुआ मैं उसी मेट्रो में सवार होता था जिसमें वह चढ़ती थी।

कुछ दिनों बाद मुझे ऐसा लगने लगा जैसे उसकी आँखें भी मुझे ढूंढ़ रही होती थी। कोई दूर का सफ़र भी नहीं था। बस दिल्ली से गुड़गांव। आखिर एक दिन मैंने देखा मुझे देख कर उसके होठों पर मुस्कुराहट तिर आई।

मैं भी मुस्कुरा दिया।मैंने उसकी तरफ़ से कुछ पूछने के पहले ख़ुद ही कुछ पूछना उचित समझा और पूछ बैठा------"आप रोज़ गुड़गांव जाती हैँ? "

ज़बाब-----"जी रोज़। जाना ही पड़ता है"

मैं -------" हाँ!कोई भी ड्यूटी करो समय से पहुंचना तो पड़ता ही है" 

मैं----"क्या मैं आप का नाम जान सकता हूँ? "

ज़बाब----"वैसे मैं अपना नाम सब को बताना उचित नहीं समझती हूँ, आप को बताये दे रही हूँ।

मैं----"सो क्यों? "

ज़बाब----"पता नहीं क्यों आप मुझे सुलझे और शरीफ इंसान लगते हैं। मेरा नाम सीमा है "

मैं----"और मैं निशांत "

           उस दिन की बात यहीं ख़त्म हो गईं। घर आकर मैं पूरी रात उसी के बारे में सोचता रहा। ख़ुद से सवाल करता रहा कि हमारे कंपनी में इतनी लड़कियाँ हैं, उन्हें छोड़ क्यों सीमा की तरफ़ खींचा चला जा रहा हूँ।

शायद उसकी सादगी और मासूमियत इसका कारण था।

         मुलाकात का सिलसिला बढ़ता गया। धीरे-धीरे वह मुझ से खुलने लगी और पूछ बैठी------"आप क्या

करते हैं? "

मैं----"एक मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्य करता हूँ "

मैं----"और आप? "

सीमा-----"जी मेरी दुकान है गुड़गांव में। "

मैं------"अच्छा तो आपने अपना व्यापार करना उचित समझा?

वर्ना सब लड़कियां अधिकतर किसी न किसी पोस्ट को हासिल करना चाहती है। खासकर  मिडिल क्लास की लड़कियों का कहना रहता है कि इतनी डिग्री ले कर किसी ऊँचे मुकाम पर पहुंचना है। "

सीमा------"माफ़ कीजियेगा। मैंने ज़्यादा पढ़ाई नहीं की है। बस सिंपल ग्रेजुएट हूँ। जानते हैं निशांत जी कभी-कभी इंसान चाहता कुछ है और हो जाता कुछ और है। मैंने भी बड़े-बड़े सपने देखे थे। लेकिन ईश्वर को शायद ये मंजूर नहीं था"

मैं-----"क्यों!ऐसा क्या हुआ? "

सीमा-----"क्या बताऊँ। जब में बी. ए में पढ़ रही थी, उसी समय पिता जी को कैंसर था पता चला। धीरे-धीरे मर्ज बढ़ता गया। परिवार आर्थिक संकट से गुजरने लगा। मेरे अलावे तीन और भाई-बहन का गुजारा कैसे होता, ये सोच कर माँ भी कमजोर हुई जा रही थी। ये दुकान पिताजी का ही खोला हुआ है। आखिर मुझे ही आगे की पढ़ाई छोड़कर आगे आना पड़ा। मैं ही घर की बड़ी बेटी थी। ऐसे में सब को बीच मंझदार में मैं कैसे छोड़ सकती थी। अतः मैं ही दुकान पर बैठने लगी। "

मैं----"ओह!कोई बात नहीं सीमा। सब की भलाई में ही अपनी भलाई है। "

             समय अपनी गति से बढ़ता रहा। सीमा से मेरी मुलाक़ात का  समय भी बढ़ता रहा। धीरे-धीरे हम दोनों एक दूसरे से काफ़ी हिल-मिल गए।करीब एक ही समय दोनों को दिल्ली लौटना होता था। हम दोनों ने समय भी मिलने का निश्चित कर लिया था। कभी-कभी कॉफी साथ पीने के लिए किसी रेस्टोरेंट में रुकने भी लगे। समय बीतता गया। मेरे घर में मुझे विवाह कर लेने पर जोर दिया जाने लगा। लेकिन सीमा के बाद कोई भी लड़की मुझे नहीं भाने लगी थी। कई बार मैंने चाहा कि सीमा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखूँ, लेकिन उसकी समस्या को देखते हुऐ हिम्मत नहीं जुटा पाया। वह हमेशा कहा करती थी कि सभी भाई-बहनों  को सेटल करने के बाद ही अपने बारे में सोचेगी।

             सयय गुजरता गया। उसने अपने भाई  को एम. बी. ए कराया, दो बहनों की शादी करवाई। तब उसने राहत की साँस ली। तब तक मेरा उसके घर में आना-जाना नियमित होने लगा था, बिल्कुक एक सदस्य की तरह।सीमा की माँ के नजरों में भी सम्मान का पात्र था। अब तक मेरी उम्र काफ़ी हो चली थी। सीमा मुझ से भी तीन साल बड़ी थी। एक तो माँ का इकलौता बेटा में बहू देखने की उनकी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा था, दूसरे मैं स्वयं भी अकेलापन महसूस करने लगा था।

      बहुत सोच विचार के बाद सीमा के आगे विवाह का प्रस्ताव रक्खा।

सीमा ने कहा-------"

निशान्त अब काफी देर हो चुकी हे। आप क्यों मेरे लिए कुर्बानी दे रहे हैं। मैंने कहा------"ये कुर्बानी नहीं है। मेरी खुशी इसी में है। क्या तुम मेरा साथ नहीं दोगी। सीमा सुन कर हतप्रभ रह गई। उसकी आँखो से अश्रू धार बह निकली। निशान्त ने उसे गले से लगा लिया।

सीमा की माँ सारी बातें सुन रही थीं। उन्होंने सीमा को समझाते हुऐ कहा--------"मान जा बेटी। निशांत से अच्छा वर नहीं मिलेगा। तूने घर के लिए बहुत त्याग किया। अब अपनी ख़ुशी देख। "

सीमा----"माँ शादी की भी एक उम्र होती है। अब आधी उम्र तो कट गईं, अब क्या रखा है।" 

माँ------"देख बेटा ज़िंदगी के आखिरी समय तक किसी की सहारे की जरुरत पड़ती है। तुम दोनों एक दूसरे से दिल से प्यार करते हो। ये शादी तो सिर्फ दो तन का ही नहीं, दो आत्माओं का मिलन होगा। जाओ एक हो जाओ। मेरा आशीर्वाद सदा साथ रहेगा।

  - डॉ मंजू लता , नोयेडा

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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