काव्य :
प्रभुकृपा
भौतिकवाद की प्रबलता के
इस आधुनिक युग में
विकास के विकल्प को ढूँढता
मानव विनाश को
दे रहा आमंत्रण।
ज़रा भी आभास नहीं उसे
किस तरह वह धीरे-धीरे
खोता जा रहा,
प्रभुकृपा से प्राप्त
मानवता के गुण,
प्रकृति की सहृदयता,
प्राणियों की सद्भावना।
मृग-मरीचिका की भाँति
वह है खोजता,
संसार में सुख का सार
भौतिक जगत में आध्यात्मिक प्रेम
वस्तुतः जो है असंभव
जैसे सेमर का फूल।
हे मानव ! तू जाग,
प्रभु-भक्ति के स्नेह से
आप्लावित कर पुनः
विश्व के कण-कण को।
-डॉ० उपासना पाण्डेय,प्रयागराज
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