काव्य :
कर्म
संसार कर्मों का बगीचा,
जिसने इसे निष्ठा से सींचा ,
उसने बुलंदी को है छुआ,
फरेबी जल ने जिंदगी को उलीचा।।
सत्कर्मों की जब करते खेती,
जीवन लेता बहुत ही रेती,
पर जब मंजिल मिल जाती,
तब जिंदगी खुशियों के अंडे देती।।
मंजिल में आती बहुत ही हटरी,
मानव है पाप पुण्य की गठरी,
निर्भर उस पर वह चुनता क्या,
पुण्य जगाये नर पाप बनाये गठरी।।
जीवन है कर्मों का प्याला,
ठंड गरम से फैलता उजाला,
जिसने दोनों को मस्ती से झेला,
उसने खाया खुशियों का निवाला।।
- नीता गुप्ता , रायपुर छत्तीसगढ़
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