काव्य :
सदियाँ ठहर गईं
हमारे दरम्यान सदियाँ ठहर गईं…
पत्तों के नोकों पर जाती शाम तनिक क्या ठहर गई
मानो सिमटकर सारी कायनात आँखों में ठहर गई।
तन्हाई के आलम में गुमसुम सा एक लम्हा जो गुज़रा
उस एक लम्हे में गोया हमारे दरम्यान सदियाँ ठहर गईं
जानें क्या कुछ कहना था, जानें क्या कुछ सुनना था
जानें कब वो सारी बातें दिल के रस्ते होंठों पर आकर ठहर गईं ।
यादों की चौखट पर कभी सन्नाटा कभी शोर का आलम रहा
आधे अधूरे ख़्वाहिशों की गठरी लिए जिंदगी दोराहे पर ठहर गई ।
दरख़्त के साये अँगड़ाई लेते मुरझाई धूप ने जब खोली आँखें
जाते जाते दिन ठहर गया, आते आते शाम ठहर गई ।
बड़े हौसले से उम्मीदों की शमा जलती रही तमाम रात
मगर, उसकी रौशनी में उसकी अपनी तारीकियाँ ठहर गईं ।
न पूछ कैसे गुज़री इंतज़ार की वो सर्द रातें
हर एक आहट पर मानो सौ सौ साँसें ठहर गईं।
- भार्गवी रविन्द्
मेंलबर्न आस्ट्रेलिया
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