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मुहावरे और कहावतें किसी भी बोली और भाषा का श्रृंगार हैं, ताकि ये एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित हो सकें-भगवान बाबाणी


मुहावरे और कहावतें किसी भी बोली और भाषा का श्रृंगार हैं, ताकि ये एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित हो सकें-भगवान बाबाणी

खंडवा। सिन्धी लोक साहित्य के विभिन्न आयामों पर मध्यप्रदेश सिन्धी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला का समापन हुआ। इस मौके पर सभी प्रतिभागियों को अतिथियों व्दारा प्रमाण पत्र सौपकर सम्मानित किया गया। निदेशक राजेश कुमार वाधवानी ने बताया कि कार्यशाला के अंतिम दिवस तीन बिंदुओं पर चर्चा हुई। सन्त शिरोमणि हिरदाराम गौरव सम्मान से सम्मानित भोपाल से पधारे भगवान बाबाणी ने सिन्धी बोली में प्रचलित मुहावरों, कहावतों और पहेलियों की जानकारी देते हुए बताया कि अन्य भाषाओं और बोलियों की तरह सिन्धी में भी इनकी प्रचुरता है और इन पर बहुत शोध कार्य भी हुआ है, वास्तव में मुहावरे और कहावतें किसी भी बोली और भाषा का श्रृंगार ही हैं, हमें सामान्य बोलचाल की भाषा में यथासंभव इनका उपयोग अवश्य करना चाहिए, ताकि ये एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित हो सकें। 

सिन्धी लोक पर्व परम्परा, रीति रिवाज और लोक विश्वासों पर हुई चर्चा

कार्यशाला ‌में सिन्धी लोक पर्व परम्परा पर चर्चा का आरम्भ करते हुए डॉ. कमला गोकलानी ने बताया कि हमारी पर्व परम्परा का आधार वैज्ञानिक है फिर चाहे वो सामाजिक परम्पराएं हों या धार्मिक परम्पराएं। पर्व परम्परा, रीति रिवाज और लोक विश्वासों के पीछे छिपी वैज्ञानिक मान्यताओं और आधार का ज्ञान हम सभी को होनाचाहिए, क्योंकि ये हमारी लोक संस्कृति का प्रमुख अंग हैं। इसके बाद डॉ. कमला गोकलानी और हर्षा मूलचंदानी ने अन्य संस्कृतियों और सिन्धी संस्कृति के बीच संबंध के बारे में अपने विचार व्यक्त किए, उन्होंने कहा कि यूं तो भारत के विभिन्न समाजों की संस्कृतियों में आपस में संबंध है लेकिन सिन्धी संस्कृति का कच्छ की संस्कृति से घनिष्ठ संबंध परिलक्षित होता है, दोनों ही संस्कृतियों की भाषा, भोजन, आभूषण, गीत संगीत आदि में कई समानताएं मिलती हैं। कार्यशाला में इन बिंदुओं के अलावा सिन्धी लोक नाट्य, सिन्धी नृत्य शैली, लोक कथा-कहानियां, लोकगीत सहित लोक साहित्य के अन्य बिंदुओं पर भी चर्चा हुई। समापन से पूर्व अंतिम सत्र में प्रदेश के विभिन्न शहरों से आए सहभागियों ने इन बिंदुओं के आधार पर अपनी प्रस्तुति भी दी। इस कार्यशाला में खंडवा से शामिल हुए सिंधी/ हिंदी साहित्यकार एवं राष्ट्रीय सिंधी समाज प्रदेश प्रवक्ता निर्मल मंगवानी ने बताया कि कार्यशाला में सुरेद्र लच्छवानी, सुरेश पारवानी, संजय वर्मा, नमोश तलरेजा, चांदनी तलरेजा, हर्षा मूलचंदानी, जया बेलानी, महेश मूलचंदानी, सुनील बुधवानी, निर्मल मंगवानी, भावना ठाकरानी,  रश्मि रामाणी, निर्मला राजानी, सागर उदासी, अजय  गुरु, प्रकाश दोडानी, अजय मोहन, विवेक तलरेजा, द्रोपदी चंदनानी, सिमरन सुखीजा, चिमन लखानी, ईश्वरचंद्र चंचलानी (उज्जैन गीत लेखक), मुरली वासवानी (फिल्म पटकथा, गीत लेखक) भारती तोलानी, सिमरन संतवानी, राजेश कोटवानी, अजय मोहन आदि कुल 30 युवा तथा वरिष्ठ साहित्यकार, कलाकार इंदौर, उज्जैन, भोपाल, खंडवा, ग्वालियर और सतना से शामिल हुए थे।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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