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लघुकथा : पहचान -डॉ० उपासना पाण्डेय , प्रयागराज


 

लघुकथा :

पहचान 

                     अपर्णा शीघ्रता से रसोईघर का काम समेटती जा रही थी, साथ ही बार-बार उसकी दृष्टि दिवार पर बढ़ते हुए समय को बताती घड़ी पर लगी हुई थी। आज सुबह उठने में उसे थोड़ी देर जो हो गई थी। उस पर विद्यालय भी सात बजे से पहले पहुँचना था। इतने में महरिन चाची भी आ गई और मुस्कुराते हुए बोली- "राम-राम बिटिया ! आज स्कूल में छुट्टी बा का ? अब तक तैयार न भऊ।" हड़‌बड़ाई अपर्णा ने उत्तर दिया -"राम-राम चाची! नहीं आज उठने में उठने में देरी हो गई। काम जितना जल्दी समेटने का प्रयास कर रही हूँ, उतना ही जैसे बढ़ता जा रहा है। शाम को आकर आपसे आराम से बातें करूँगी।" 

        "ठीक बा, बिटिया ! शाम के मिलिबै तब आपन कथा बताइब"- कहते हुये चाची ने झाड़ू उठायी और लगाने लगी । साथ ही बड़े मधुर स्वर में गीत गुनगुनाने लगीं। स्वरों की मधुरता ने अपर्णा का ध्यान इन व्यस्त क्षणों में भी आकर्षित कर लिया, पर घड़ी देख वह पुनः सावधान होकर कार्य में लग गई। प्रभु को मनाते-मनाते विद्यालय पहुँची परन्तु दिन भर चाची के मधुर स्वर कानों में गूँजते रहे।

      अपर्णा शाम बड़ी व्याकुलता से महरिन चाची की प्रतीक्षा कर रही थी। जैसे ही चाची आई, वह बोली उठी। चाची आज सवेरे जो आप गुनगुना रहीं थीं,वह कौन- सा गीत था? चाची मुस्कुराते हुये बोली - " वह तौ देवीगीत रहा बिटिया, काहे पहिले सुनी न हौ का। हमरे तरफ  हर मौके पर ऐसेनहि देवीगीत गावा जात है।"

          उत्साहित अपर्णा बोली - "चाचीजी, यह लोकगीत है। आज के कार्यक्रमों में इनकी बड़ी माँग है पर हमारी पीढ़ी को गिने-चुने गाने ही पता होते है। यह गीत मैंने पहले कभी नहीं सुना था। क्या आप मुझे सिखाएँगी"- कहते-कहते अपर्णा की दृष्टि चाची के मुख पर टिक गयी। '"अरे बिटिया, का हमका झाड़ पर चढ़ावत हऊ । दस घरे बर्तन माजय का रहत है। तबऊ कल तोका जरूर सिखाइब"- कहते-कहते 'बर्तने माँजने चली जाती है।

     दूसरे दिन अपना सारा काम चाची शीघ्रता से समाप्त कर अपर्णा के घर पहुँची। वास्तव में उसका व्यवहार और सम्मान चाची को बहुत भाता था। वह उसे हृदय से बिटिया मानती थीं। उन्होंने गीत सिखाना प्रारम्भ किया पर अपर्णा को ग्रामीण भाषा सीखना कठिन लग रहा था। सीखने का समय भी कम था अत: उसने चाची का गाते हुये वीडियो बना लिया। जिससे वह बार-बार सुनकर गीत को सीख सके और उनका समय भी व्यर्थ न हो।

      अब तो सप्ताह में एक दिन उन दोनों का सीखने-सिखाने का कार्यक्रम बँध-सा गया । उन दोनों को भी यह करने में बहुत अच्छा लगता था। एक दिन अपर्णा ने चाची का विडियो यू-ट्यूब पर 'लोकगीत मंचन 'शीर्षक से डाल दिया। देखते ही देखते वह वायरल हो गया। उत्साहित अपर्णा ने धीरे-धीरे और विडियो डाले। उससे धनार्जन भी होने लगा। अपर्णा ने ईमानदारी से महरिन चाची को पचास प्रतिशत पारिश्रमिक देने का निश्चय किया।

      उन रुपयों और लोकप्रियता को देख महरिन चाची की आँखें भर आईं और अवरुद्ध गले से अपर्णा को बहुत आशीर्वाद देने लगीं। आज उसने चाची की गायकी के गुण से उनकी अलग पहचान बना दी।

    -डॉ० उपासना पाण्डेय , प्रयागराज

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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