काव्य :
सर्दी के दिन
दरवाजे की फांक से
चुप,छुप घुस आये धूप
सर्दी की हर ही सुबह
ये भाए, सुनहरा रूप
सर्दी में सूरज छुपता
काले काले बादल में
ज्यों बच्चा छुप जाता है
अपनी माँ के आंचल में
जली अँगीठी सेंकते
कुहरे में सब लोग
धुएँ का बादल फेंकते
अपने मुंह से लोग
सुबह सुबह ही काँपती
यहाँ रोज ही ठंड
सूरज लड़ता बादल से
क्यों रोज ही जंग
ओस गिरे आकाश से
घास पे बनती बर्फ
ऊंचाई और जमीन का
देखा ब्रज ने फर्क
समय कहाँ है कब रहा
स्थिर,एक समान
गरमी सब की जम जाती है
हो जाती बर्फ समान
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
Tags:
काव्य
.jpg)
