वुल्फ़ सुपरमून और बदलता हुआ आकाशीय परिदृश्य
[वुल्फ़ सुपरमून: आकाशीय घटना से आत्मिक अनुभूति तक]
[साल की पहली पूर्णिमा बनेगी खास, दिखेगा वुल्फ़ सुपरमून]
• प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
3 जनवरी 2026 की रात आकाश एक असामान्य खगोलीय स्थिति का साक्षी बनेगा। इसी रात वर्ष का पहला पूर्ण चंद्रमा वुल्फ़ सुपरमून के रूप में दिखाई देगा, जब चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत निकट होकर सामान्य से अधिक बड़ा और अधिक चमकीला नजर आएगा। यह स्थिति केवल दृश्य परिवर्तन नहीं है, बल्कि सूर्य-पृथ्वी-चंद्रमा की दुर्लभ ज्यामिति का परिणाम है। ठंडी रात में फैली इसकी तेज रोशनी पूरे आकाशीय परिदृश्य को बदल देगी और सामान्य पूर्णिमा से अलग, अधिक प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराएगी। यह दृश्य खगोलीय गणनाओं की सटीकता और प्रकृति की नियमित शक्ति — दोनों को एक साथ उजागर करेगा।
यह सुपरमून इसलिए विशेष माना जा रहा है क्योंकि इसी समय चंद्रमा अपनी कक्षा के उस बिंदु पर होगा जहाँ वह पृथ्वी के सबसे अधिक समीप होता है — जिसे खगोल विज्ञान में पेरिगी कहा जाता है। इस निकटता का सीधा प्रभाव उसके आकार और प्रकाश पर पड़ता है। सामान्य पूर्णिमा की तुलना में चंद्रमा अधिक बड़ा और कहीं अधिक चमकीला दिखाई देगा। भारत में इसका पूर्ण चरण भले ही दोपहर में बने, पर इसका वास्तविक प्रभाव सूर्यास्त के बाद दिखाई देगा, जब पूर्वी क्षितिज से उभरता चंद्रमा असामान्य रूप से विशाल और प्रभावशाली लगेगा। वायुमंडल की परतें उसकी रोशनी को पीले-सुनहरे और तांबे जैसे रंगों में ढाल देंगी, जिससे पूरा दृश्य ऐसा प्रतीत होगा जैसे आकाश ने नववर्ष के स्वागत में प्रकाश प्रज्वलित कर दिया हो।
“वुल्फ़ मून” नाम केवल एक संबोधन नहीं, बल्कि मानव इतिहास से जुड़ी एक गहरी स्मृति है। उत्तरी गोलार्ध की प्राचीन संस्कृतियों ने जनवरी की पूर्णिमा को यह नाम इसलिए दिया, क्योंकि इसी समय सर्द रातों में भेड़ियों की आवाज़ें अधिक सुनाई देती थीं। यह हूक भय या अभाव की नहीं, बल्कि आपसी संकेत, समूहबोध और जीवन-चक्र की निरंतरता का स्वर थी। भेड़िये सिर उठाकर आकाश की ओर हौल करते हैं ताकि उनकी आवाज़ दूर तक फैल सके — मानो वे चंद्रमा को साक्षी मानकर अपने अस्तित्व और क्षेत्र की घोषणा कर रहे हों। इस प्रकार वुल्फ़ मून केवल एक खगोलीय घटना नहीं रह जाता, बल्कि प्रकृति की सामूहिक स्मृति और जीव-जगत के संवाद का प्रतीक बन जाता है।
इस वर्ष वुल्फ़ सुपरमून को और अधिक उल्लेखनीय बनाता है एक दुर्लभ खगोलीय संयोग। ठीक 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट बिंदु, पेरिहेलियन पर भी होगी। इसका परिणाम यह होगा कि सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा के साथ चंद्रमा पर पड़ेंगी, जिससे उसकी चमक में हल्की अतिरिक्त गहराई और तीव्रता दिखाई देगी। यद्यपि वैज्ञानिक दृष्टि से यह अंतर सूक्ष्म होता है, पर दृष्टिगत प्रभाव अत्यंत आकर्षक बन जाता है। समुद्री क्षेत्रों में इस संयुक्त गुरुत्वीय प्रभाव के कारण ज्वार-भाटे सामान्य से कुछ अधिक ऊँचे उठ सकते हैं, जिससे प्रकृति की यह खगोलीय संगति धरती पर भी अपना असर छोड़ती दिखाई देगी।
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में यह पूर्णिमा पौष पूर्णिमा के रूप में प्रतिष्ठित है, जिसे आत्मशुद्धि और साधना का विशेष पर्व माना जाता है। इसी दिन से माघ मास का आरंभ होता है और प्रयागराज में कल्पवास की परंपरा प्रारंभ होती है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर लाखों श्रद्धालु स्नान कर मानसिक शांति और आत्मिक पवित्रता की कामना करते हैं। यह तिथि शाकंभरी देवी को भी समर्पित मानी जाती है, जो अन्न, वनस्पति और जीवन-पोषण की अधिष्ठात्री हैं। जब यही पावन तिथि सुपरमून से जुड़ती है, तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव और अधिक गहन हो जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप और ध्यान दीर्घकाल तक सकारात्मक फल प्रदान करता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से यह पूर्णिमा मानसिक ऊर्जा को सक्रिय और सुस्पष्ट करने वाली मानी जाती है। चंद्रमा मन का प्रतिनिधि है, और जब वह पूर्ण अवस्था में होता है, तब भावनाएँ, स्मृतियाँ और संकल्प अधिक स्पष्ट रूप में उभरते हैं। यह समय आत्मनिरीक्षण, लेखन, ध्यान और मौन साधना के लिए विशेष अनुकूल माना जाता है। बृहस्पति की अनुकूल स्थिति इसे संतुलन प्रदान करती है, जिससे भावनात्मक अस्थिरता के स्थान पर विवेक, संयम और स्पष्ट सोच विकसित होती है। इसी कारण अनेक परंपराओं में सुपरमून की रात को “अंतर्दृष्टि की रात” कहा गया है।
इस खगोलीय दृश्य में रोमांच का एक और आयाम जुड़ता है — क्वाड्रैंटिड उल्का वर्षा। 3 और 4 जनवरी की रात यह वर्षा अपने चरम पर होती है और अनुकूल परिस्थितियों में प्रति घंटे अनेक उल्काएँ दिखाई दे सकती हैं। यद्यपि पूर्ण चंद्रमा की तीव्र रोशनी कई छोटी उल्काओं को ढक देगी, फिर भी कुछ अत्यंत चमकीली अग्नि-रेखाएँ आकाश को चीरती हुई स्पष्ट दिख सकती हैं। यह दृश्य ऐसा प्रतीत होगा मानो स्थिर और गंभीर चंद्रमा के सामने समय स्वयं प्रकाश की लकीरों में बह रहा हो। स्थायित्व और क्षणभंगुरता का यह संगम मन को गहराई से छू जाता है।
इसी अवधि में चंद्रमा का लिब्रेशन भी अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट दिखाई देता है — अर्थात उसका हल्का-सा डोलना, जिसके कारण उसके किनारों पर स्थित पर्वत, घाटियाँ और क्रेटर दृष्टिगोचर होने लगते हैं। दूरबीन या कैमरे से देखने पर चंद्र सतह की वे संरचनाएँ उभर आती हैं जो सामान्य दिनों में दिखाई नहीं देतीं। हिमालय की ऊँचाइयों, मरुस्थल की निस्तब्धता या किसी शांत नदी-तट से देखा गया यह दृश्य अलग-अलग अनुभूतियाँ रचता है। शहरों की कृत्रिम रोशनी से दूर खुले आकाश के नीचे यह अनुभव लगभग ध्यान की अवस्था जैसा हो जाता है।
वुल्फ़ सुपरमून एक गहरा संकेत छोड़ता है। वह बताता है कि सबसे ठंडी और लंबी रातों में भी जीवन की लय थमती नहीं। भेड़ियों की हूक यह स्मरण कराती है कि अंधकार केवल सन्नाटा नहीं, संवाद की संभावना भी है। यह चंद्रमा सिखाता है कि शक्ति हमेशा शोर में प्रकट नहीं होती — कई बार वह शांति बनकर उजास फैलाती है। वर्ष 2026 की शुरुआत इसी भाव के साथ होती है कि भीतर की रोशनी को पहचाना जाए, उसे दिशा दी जाए और अंधेरे से भयभीत होने के बजाय उसे समझा जाए। क्योंकि हर पूर्णिमा, विशेषकर यह वुल्फ़ सुपरमून, यह सिखाती है कि प्रकाश बाहर नहीं, भीतर से जन्म लेता है।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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