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लघुकथा : आत्ममुग्ध - डॉ.सत्येंद्र सिंह , पुणे, महाराष्ट्र


 

लघुकथा :

                      आत्ममुग्ध 


      संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते  एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है,  क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।

      सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए।  न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में  शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , "हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर" और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।

     ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी  बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे।  उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।


            -      डॉ.सत्येंद्र सिंह 

                  पुणे, महाराष्ट्र

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

3 Comments

  1. सत्येंद्र सिंह जी,
    मनुष्य स्वभाव का अति उत्तम विश्लेषण किया है। यह बीमारी सोशल मीडिया में भी दिखाई देती है। हार्दिक बधाई!😊👌

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  2. कहानी पर रहीम जी की ये दो पंक्तियां सटीक हैं–
    "जो रहीम ओछो बढ़े, तौ अति इतराय।"
    "प्यादे से फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय।।"
    बेहतरीन व्यक्तित्व चित्रण के लिए लेखक को बधाई।

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    1. कमलेश झा, झांसी

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