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काव्य : राष्ट्र पुरुष - रामनारायण सोनी , इंदौर


 

काव्य : 

राष्ट्र पुरुष


अपना चिर संचित पुण्यकोष

जग के अरण्य में महका है

विपुल धरा का कण-कण भी

यूँ चंचरीक सा चहका है


ऋषियों की वाणी ऋतम्भरा

हवि संग ऋचाओं का होता

पावन यज्ञों की समिधा से

मंगलमय हवन जहाँ होता


हैं श्रृंगशिखर ये कनक मढ़े

हैं वृक्ष रूप में रोम खड़े

अंगों से बहता पावन जल

इस नग विराट के दान बड़े


भूतल पर बहती सरिताएँ

संस्कृति की ये पुष्ट शिराएँ

श्वेत श्याम इन पाषाणों से

देवों की निर्मित प्रतिमाएँ


भू भाग घिरा जो सीमा से

केवल वह, राष्ट्र नहीं है

जन गण मन भाषा भाव जुड़ें

समझो सब राष्ट्र यही है


उत्तर में उन्नत नग विशाल

केसर सौरभ से लसित भाल

प्राची पश्चिम के भुज प्रलम्ब

उर में संस्कृति की विजय माल


दक्षिण में द्रविड़ धरोहर है

वैभव का मान सरोवर है

आदिकाल की परम्परा का

पालक पोषक तरुवर है


आएँ मिल कर करें वन्दना

राष्ट्र देव की करें अर्चना

विश्व-गगन में, सर्व दिशा में

विजय गान की गूँज-गर्जना


फिर से भारत हो विश्व गुरू

फिर से जानें रघु और पुरू

वसुधा के कोने कोने में

हों फिर से गौरव गान शुरू


राष्ट्र सुरक्षित और सबल हो

कोटि कण्ठ जयघोष करें

कोटि करों से संकल्पों का

जन जन मिल उद्घोष करें


 - रामनारायण सोनी , इंदौर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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