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नवग्रह में जीवन दर्शन (भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में) - डॉ हंसा व्यास , नर्मदापुरम


 

नवग्रह में जीवन दर्शन (भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में) 

  - डॉ हंसा व्यास , नर्मदापुरम

     नवग्रह का नाम आते ही मानव स्वभाव भयभीत होने लगता है। अपनी हर समस्या का कारक कभी शनि को मानता है तो कभी राहु - केतु को दोष देने लगता है। इस पंडित से उस ज्योतिष के चक्कर लगाने लगता है । तरह तरह के अनुष्ठान के लिए भटकने लगता है। कभी अपने आपको दोष देने लगता है तो कभी ईश्वर से शिकायत करने लगता है कि मेरे साथ ही बुरा क्यों होता है ? वो गलत सोचता है उसके साथ गलत ही होने लगता है। फिर धीरे-धीरे भाग्य को दोष देकर निराश हो जाता है। वह सफल व्यक्ति को तो देखता पर उस सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे छुपी हुई मेहनत को, अनुशासन को और नियमित दिनचर्या को नहीं देखता। भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा में वो सब कारण विद्यमान है जो किसी को भी सफलता के शिखर तक पहुंचा सकते हैं। आस्था के साथ हमारा सकारात्मक दृढ़ संकल्प सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में “नवग्रह” की अवधारणा केवल ज्योतिषीय गणना का उपकरण नहीं है, बल्कि यह जीवन-दर्शन, समय-बोध, नैतिक अनुशासन और आत्म-विकास का एक गहन प्रतीकात्मक तंत्र भी है। यदि इसे समकालीन संदर्भ में पुनर्पाठ किया जाए, तो यह युवा पीढ़ी के लिए एक अत्यंत प्रासंगिक मार्गदर्शक बन सकता है—जहाँ आकाशीय ग्रहों के माध्यम से मनुष्य के आंतरिक और सामाजिक आयामों को समझने की प्रेरणा मिलती है।

नवग्रह—सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—को परंपरागत रूप से मानव जीवन के विभिन्न पक्षों का नियामक माना गया है। परंतु भारतीय जीवन दृष्टि से ये केवल बाह्य शक्तियाँ नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों और जीवन-स्थितियों के प्रतीक हैं। उदाहरणार्थ, सूर्य आत्मविश्वास, नेतृत्व और ऊर्जा का प्रतीक है। आज के युवाओं के लिए यह संदेश है कि वे अपने भीतर के “सूर्य” को जागृत करें—अर्थात् आत्म-प्रकाश और नेतृत्व क्षमता का विकास करें।

इसी प्रकार चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। डिजिटल युग में जहाँ मानसिक तनाव और अस्थिरता बढ़ रही है, वहाँ चंद्र का संदेश है—भावनात्मक संतुलन, मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-चिंतन का अभ्यास। मंगल साहस और क्रियाशीलता का प्रतीक है, जो युवाओं को केवल विचार करने के बजाय कर्मशील बनने के लिए प्रेरित करता है। 

बुध बुद्धि, संवाद और विवेक का प्रतीक है। सूचना-प्रौद्योगिकी के इस युग में जहाँ सूचनाओं की बाढ़ है, बुध का सन्देश है—विवेकपूर्ण चयन और प्रभावी संप्रेषण। वहीं बृहस्पति (गुरु) ज्ञान, नैतिकता और मार्गदर्शन का प्रतीक है, जो युवाओं को केवल जानकारी ही नहीं, बल्कि मूल्य-आधारित शिक्षा की ओर उन्मुख करता है।

शुक्र कला, सौंदर्य और संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है, जो जीवन में संतुलन और संवेदनशीलता की आवश्यकता को रेखांकित करता है। 

शनि से हम डरते हैं, जिसे प्रायः कठोरता का प्रतीक माना जाता है, वास्तव में अनुशासन, परिश्रम और न्याय का संदेश देता है—जो दीर्घकालिक सफलता के लिए अनिवार्य है।

अंततः राहु और केतु जीवन के अनिश्चित, रहस्यमय और परिवर्तनशील पक्षों के प्रतीक हैं। ये युवाओं को यह सिखाते हैं कि भ्रम, असफलता और परिवर्तन भी विकास की प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिन्हें भय नहीं बल्कि समझ और स्वीकार्यता के साथ अपनाना चाहिए।

हम इन सभी ग्रहों से अनुशासन सीखकर जीवन में सफल हो सकते हैं। नियमित मंत्रोच्चारण हमारी स्मरण शक्ति को, हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

इस प्रकार, नवग्रह की अवधारणा को यदि आधुनिक जीवन के संदर्भ में रूपांतरित किया जाए, तो यह युवा पीढ़ी के लिए एक समग्र व्यक्तित्व विकास का मॉडल प्रस्तुत करती है। यह उन्हें बताती है कि बाहरी ग्रहों की गति से अधिक महत्वपूर्ण है—अपने भीतर के “ग्रहों” का संतुलन। जब व्यक्ति अपने आत्मबल (सूर्य), मन (चंद्र), कर्म (मंगल), बुद्धि (बुध), ज्ञान (बृहस्पति), संवेदना (शुक्र), अनुशासन (शनि) और परिवर्तनशीलता (राहु-केतु) को संतुलित कर लेता है, तब वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता और संतुलन प्राप्त कर सकता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा कहती हैं कि नवग्रह की परंपरा युवा पीढ़ी के लिए आत्म-चेतना, संतुलन और समग्र विकास का एक सशक्त संदेश है—जो उन्हें अपने जीवन का “ग्रह-नियंता” बनने की प्रेरणा देती है।

 - डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम 

hansavyas5418@gmail.com

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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