प्रासंगिक है बुद्ध का मौन संदेश : मौन खामोश नहीं, बल्कि सृजन, संवेदना और सत्य का सबसे मुखर उद्घोष है
- डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम
भगवान बुद्ध का मौन से गहरा संबंध है। मौन साधना का पहला नियम भी है और अनुशासन भी । साधना फिर चाहे कला की हो या तपस्या की। मानव सभ्यता की यात्रा में मौन सदैव एक रहस्यमय और शक्तिशाली साधन रहा है। प्रथम दृष्टि में यह खामोशी प्रतीत होता है, परंतु वस्तुतः यह मुखरता का गहनतम स्वर है। शब्द जहाँ बाह्य जगत से संवाद स्थापित करते हैं, वहीं मौन आत्मा और अस्तित्व के गहनतम आयामों से जुड़ता है। भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में मौन शब्दों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि चेतना की उपस्थिति है।
भारतीय दर्शन में मौन (मौनं) को सर्वोच्च साधना माना गया है। उपनिषदों में ब्रह्म को "यतो वाचो निवर्तन्ते" कहकर परिभाषित किया गया है – जहाँ वाणी लौट आती है, वही ब्रह्म है। गौतम बुद्ध का ध्यानमग्न मौन संपूर्ण करुणा और करुणामयी सत्य का उद्घोष है। रामकृष्ण परमहंस , महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती , विवेकानंद जैसे संतों का मौन केवल व्यक्तिगत साधना नहीं था, बल्कि साधकों के लिए शिक्षा और आत्मोन्नति का मार्गदर्शन था। इस दृष्टि से मौन खामोशी नहीं, आत्मा की मुखर भाषा है, जो शब्दातीत सत्य को अभिव्यक्त करता है।
साहित्य के धरातल पर में मौन एक सशक्त प्रतीक है। कवि और साहित्यकार अनेक बार मौन का उपयोग उन भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने हेतु करते हैं, जिन्हें शब्द पूर्णतः पकड़ नहीं सकते। कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम् में नेत्रों और मौन भावों से प्रेम की तीव्रता प्रकट की। मौन आधुनिक साहित्य में पीड़ा, विद्रोह और अनकही संवेदनाओं की भाषा बन जाता है। हिंदी कवि अज्ञेय के लिए मौन "सृजन की नाभि" है। साहित्यकार जानते हैं कि कभी-कभी शब्द अधूरे होते हैं, जबकि मौन संपूर्ण कथा कह जाता है। अज्ञेय कहते हैं - मौन भी अभिव्यंजना है, जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो।निराला लिखते हैं -
मौन मधु हो जाए भाषा मूकता की आड़ में,
मन सरलता की बाढ़ में, जल-बिंदु-सा बह जाए।
सरल अति स्वच्छंद जीवन, प्रात के लघुपात से,
उत्थान-पतनाघात से रह जाए चुप, निर्द्वंद ।
सांस्कृतिक एवं समाजशास्त्रीय दृष्टि से भारतीय संस्कृति में मौन व्रत एक अनुशासन, संयम और साधना की प्रक्रिया है। विवाह संस्कार से लेकर संन्यास तक, मौन की भूमिका संस्कारों में दिखाई देती है। साधु-संतों के मौन व्रत समाज में आत्मसंयम, धैर्य और आंतरिक शक्ति का प्रतीक बने।
लोक संस्कृति में भी, ‘मौन’ का अर्थ केवल न बोलना नहीं, बल्कि दूसरों की पीड़ा को सुनना और आत्मसात करना है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो मौन संवाद का ऐसा रूप है, जो अनकहे शब्दों को भी गूंजने देता है।
साधना में मौन -
ईसाई परंपरा में "साइलेंस ऑफ प्रेयर" आत्मा और ईश्वर का मिलन है। बौद्ध साधना में मौन आत्मज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है। पश्चिमी दार्शनिक विट्गेंश्टाइन कहते हैं – जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता, उस पर मौन रहना चाहिए। स्पष्ट है कि मौन सार्वभौमिक है, और उसकी मुखरता सीमाओं से परे जाकर मानवता को जोड़ती है।भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मौन को परम सत्य की अनुभूति का द्वार माना गया है। उपनिषद कहते हैं कि ब्रह्म वह है जहाँ वाणी और मन लौट आते हैं। गौतम बुद्ध का मौन उपदेश करुणा और आत्मज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाण था । महर्षि का मौन सैकड़ों साधकों के लिए शिक्षा बन गया, बिना एक शब्द कहे। यहाँ मौन खामोश नहीं है; यह साधक की आंतरिक मुखरता है, जो शब्दों से परे सत्य को उद्घाटित करती है।
मौन का संदेश – आधुनिक संदर्भ में
आज की भागदौड़, शोरगुल और अति-संवाद वाली दुनिया में मौन और भी प्रासंगिक हो गया है। यह हमें आंतरिक संतुलन देता है । यह सुनने की संस्कृति विकसित करता है, जबकि आधुनिक समाज केवल बोलने की प्रवृत्ति में खो गया है। मौन हमें आत्ममंथन का अवसर देता है, जिससे व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तर पर सशक्तिकरण संभव है।
अतः यह स्पष्ट है कि मौन कभी भी निष्क्रिय या खामोश नहीं होता। वह मनुष्य के भीतर और बाहर, दोनों स्तरों पर मुखर संवाद करता है। शब्द जहाँ क्षणिक होते हैं, मौन वहाँ शाश्वत है। यह आत्मा और ब्रह्मांड का शाश्वत संगीत है, जो सुनने वाले के हृदय में प्रतिध्वनित होता है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, साहित्यिक सृजन और सांस्कृतिक जीवन में मौन उसी कारण से इतना ऊँचा स्थान रखता है।
- डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम
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