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कई ज़याकों और तेवरों से सजी काव्य चौपाल


कई ज़याकों और तेवरों से सजी काव्य चौपाल


दिल्ली ।  विश्व मैत्री मंच की दिल्ली इकाई के ऑनलाइन कार्यक्रम में खूबसूरत काव्य चौपाल सजी।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व मैत्री मंच की संस्थापिका अध्यक्ष आ. संतोष श्रीवास्तव जी ने की। उन्होंने पहले कुछ आवश्यक निर्देश हम सबको दिए , तत्पश्चात उन्होंने एक बेहतरीन नज़्म  हम सबके सामने परोसी जिसके बोल थे, "आईए मेहरबां मेरा घर देखिए, इसकी हर शै पर अपना असर देखिए।"
इस प्रस्तुति से शाम का रंग और भी केसरिया हो गया।
 इस काव्य चौपाल का संयोजन डाॅ रानी श्रीवास्तव ने बहुत  ही सुव्यवस्थित ढंग से किया।
।सीमा पुरबा के सधे हुए संचालन से कार्यक्रम और भी रोचक हो गया।
कार्यक्रम की शुरूआत चंचल हरेंद्र वशिष्ठ ने अपने सुमधुर स्वर में वन्दना गाकर किया।
इस कार्यक्रम में 27  प्रतिष्ठित कवित्रियों ने शिरकत की। 
श्रृंगार रस,रौद्र रस,वीभत्स रस आदि की धीमी धीमी फुहार ने शाम को ख़ुशनुमा बना दिया।
 प्रतिभागी कवयित्रियों में डाॅ दुर्गा सिन्हा 'उदार 'की रचना, "युद्ध की विभीषिका का दंश सभी झेलते, फिर भी जाने कैसे खून की है होली खेलते, कैसा है स्वार्थ कैसा यह अभिमान है प्रेम प्यार,प्रीति स्नेह की हैं भाषा भूलते।" 
शकुंतला मित्तल की रचना ,"कल रात स्वप्न में देख तुम्हें सुधियों के दान द्वार खुले,मन में प्रेम प्रसून खिले।"
वन्दना रानी दयाल ने "देखती हूं मोहब्बत में अब वो बात ना रही, राब्तों में अब वो कश्फ़ ओ करामत ना रही"।
डॉक्टर सुधा कुमारी की रचना,"मन की नाव करें स्थिर पतवार धर्म की धरिए, याद रहे नाविक है प्रभु संसार पार जब करिए।"
 सविता स्याल ने एक बहुत  ही महत्वपूर्ण प्रश्न हम सबके सामने रखा,"कैकेयी तुम्हारा पुत्र मोह न जाने क्यों खल गया, लाखों करोड़ों भृकुटियां तन गईं तुम्हारी ओर"।
 प्रेम में पगी सुरेखा जैन की रचना, "प्यार क्या है जो जीने के लिए जरूरी है, मन की है यह प्यास जितना पियो अधूरी है। मरघट है जीवन गर मन से मन की दूरी है, खोजोगे इसे कहां यह तो मृग कस्तूरी है।
"संतोष बंसल ने अपनी रचना द्वारा  युद्ध की विभीषिका का दृश्य उकेरा, "छोटे छोटे हाथों की निशानियां लिए रोती पीटती और बिलखती माएं, उनकी तस्वीर लिए खड़ी है समूह में खुद ही उनकी कब्रों के पास।
"डॉ प्रवीण शर्मा की रचना, "कोई तो पूछे मेरी तबीयत, ना जो पूछे मेरी हैसियत।
"अंजू अग्रवाल उत्साही की रचना, "धधक रही यूं धरा आज क्यूं , दहक रहा हर दृश्य आज क्यूं।"
डाॅ रानी श्रीवास्तव ने आजकल चल रही त्रासदी को अपनी रचना के माध्यम  से बताया ," मैं बीच सड़क पर बैठी हूं,मेरे चारों ओर बहुमंज़िली इमारतें हैं मगर अब वे ध्वस्त हैं।"
 मनोरमा की रचना, "आप्लावित है अपनी विशालता में, आच्छादित किया है पूरी वसुधा को अपने आगोश में पर बचा नहीं पाती अपने अस्तित्व को।
"अनीता तिवारी की रचना, "वासना की वेदी पर फिर एक मासूम भेंट चढ़ गया, इंसानियत का मस्तक शर्म से नीचे की ओर झुक गया।
"राधा गोयल  की रचना," द्रुपदसुता के स्वयंवर के लिए शर्त रखी थी एक, जल में बिम्ब देख शर से मछली की आंख दे भेद।" 
नीलम दुग्गल नरगिस ने एक बहुत  खूबसूरत संदेशपूर्ण बात पूछी,"इंसानियत पर मेरा भरोसा कायम है अब तक, फिर क्यों मेरा भरोसा तोड़ने में लगे हैं लोग।"
प्रकाश कंवर की रचना, "सुनो प्रिय, मैंने तो तुम्हें खोया, पर पता है तुमने तो बहुत कुछ खोया।
"अश्विनी देशपांडे की रचना, "जाग मनुष्य कुछ तो सोच, प्रकृति को और ना नोच, समभाव में है समझदारी। तेरी है बस हिस्सेदारी।
"शैलबाला रवि "सरल" की रचना,"कल बरसाती तूफानी निशा में जल अंबर से बरस रहा था, विरल विडंबना विधि की देखो घट पानी को तरस रहा था।
" चंचल हरेंद्र वशिष्ठ ने बहुत  ही दिल को छू लेने वाली बात अपनी रचना के माध्यम से कही, "सुख सुविधा भले ना हो पर कितना अच्छा लगता है, सारी दुनिया घूम ली पर अपना घर अच्छा लगता है।
"सरिता गुप्ता की रचना,"मिलजुल कर हँस लीजिए जीवन के दिन चार,जिम्मेदारी तो सदा सर पर रहे सवार।
"रेनू 'रतन'' मिश्रा की रचना, "आज बहुत है शोर सखी साजन आएंगे, सुरभित है चहुं ओर सजन खुशबू लाएंगे।
"सीमा पुरबा की रचना, "मेरे दिल में बसे हो तुम, मेरी हर साँस में प्रिय तुम हो, मेरे मन में छुपे सारे वो जज्बात प्रिय तुम हो।"
 बबीता किरण गर्ग ने आपनी रचना में कहा ,"मेरे हृदय की सारी बातों का संज्ञान लेता है अच्छे बुरे हर वक्त को वह जान लेता है मेरे विश्वास की नदिया सुखेगी भला कैसे हर बार मेरी बात मेरा राम मान लेता है"। 
 आभा कुलश्रेष्ठ ने अपनी रचना  मन में बसता इक संसार, ऐसी-ऐसी व्यथा समेटे जिनका आर न पार।
 मन में बसता इक संसार। 
 और इसके अलावा सुनीता बंसल, निशा रानी गर्ग ..आदि प्रतिष्ठित कवित्रियों ने भी अपनी रचनाओं द्वारा  इस काव्य चौपाल में शिरकत कर इसका मान बढ़ाया। 
डाॅ शुभ्रा,  साधना वैध,  सरोज गुप्ता , डाॅ मुक्ता  ...आदि ने इस काव्य चौपाल मे अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर इसे गरिमामय बनाया।
कार्यक्रम का समापन अर्चना पांड्या द्वारा दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल ,"पीर पर्वतों से पिघलनी चाहिए।"  गाकर हुई।
इस तरह दिल्ली इकाई की काव्य चौपाल कई ज़ायकों और तेवरों को समेटे हुए विभिन्न कर्ण मधुर और स्तरीय रचनाओं से सुसज्जित और सफल रही।



   वन्दना रानी दयाल 
     वैशाली गाजियाबाद
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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