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काव्य : त्यौहार ? - जूही गुप्ते , पुणे


 

काव्य : 

त्यौहार ?


ये वही दिन होता है न

जिस दिन स्त्रियाँ कठिन परीक्षा देती हैं ?


जरी वाली साड़ियाँ , भारी भरकम ड्रेस 

किचन में झोंकती खुद का अस्तित्व 

कि बाद में खा सके ताने, उन अतिथियों से , 

जो उसका हाल नहीं पूछते साल भर | 


ओह अच्छा वही दिन न 

जिस दिन वे सुबह से रात तक 

किसी न किसी का अहंकार सहती है ?

क्षणभर तारीफ़ से तृप्ति तो मिलती है 

पर किलो भर की अवांछित सलाह के बाद 


और फिर स्त्रियों का आखरी जत्था 

बैठता है अक्सर देरी से वो व्यञ्जन चखने , 

जो रंग रूप स्वाद भुला चुके होते हैं 

आतिथ्य के परोपकार से थके हुए | 


कोई पुरुष पसर जाता है 

थाली का स्वाद लेने पर किसी भी कमरे में 

बिन मिले किसी नापसंद व्यक्ति से

उसको ऐसी आदतें रखने का हक़ है


पर स्त्री को करनी होती हैं 

सबसे बातें , सबसे नाते उसी के होते हैं 

उसको परखा जाता है , 

घर में रखी चीज़ों की अवस्था से 

सत्कार की सारी व्यवस्था से


स्त्री मेज़बान हो या अतिथि 

बेतुके नियमों का सख़्ती से पालन करना 

ही तो उसका कर्त्तव्य है

संस्कृति का दर्शन उसी से तो होता है 


हाँ, त्यौहार का आनंद सिर्फ 

सिर्फ वे मनाते हैं 

जो ऐसी परीक्षा में नहीं बैठते | 


- जूही गुप्ते , पुणे

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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