आपने जनगणना का मकान का स्व विवरण भरा ? यह सरल है!
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
डिजिटल युग में जब मनुष्य अपनी उपस्थिति मोबाइल स्क्रीन पर दर्ज कराता हुआ स्वयं को प्रमाणित करता फिरता है, तब जनगणना जैसी परंपरागत प्रक्रिया का भी रूपांतरण होना स्वाभाविक था। भारत की आगामी जनगणना 2027 इसी परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है, जिसमें पहली बार नागरिकों को स्वयं अपने घर और परिवार का विवरण भरने की सुविधा दी गई है। यह सुविधा केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं बल्कि प्रशासनिक सोच में आए बदलाव का संकेत है, जहाँ नागरिक केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि कर्तव्य परायण सक्रिय सहभागी बनता है।
स्व गणना की यह प्रक्रिया मूलतः इस विचार पर आधारित है कि व्यक्ति अपने घर की परिस्थितियों को सबसे बेहतर जानता है, इसलिए वह स्वयं ही उसे दर्ज करे। इसके लिए सरकार ने se.census.gov.in नामक पोर्टल विकसित किया है, जहाँ कोई भी नागरिक अपने मोबाइल या कंप्यूटर के माध्यम से घर बैठे अपनी जानकारी भर सकता है। इस प्रक्रिया का समय सामान्यतः पंद्रह से बीस मिनट का बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसे सरल और सहज रखने का प्रयास किया गया है ।
प्रक्रिया की शुरुआत एक साधारण पंजीकरण से होती है। व्यक्ति पोर्टल पर जाकर अपना मोबाइल नंबर दर्ज करता है, जिसके बाद उसे एक ओटीपी प्राप्त होता है। यह ओटीपी केवल तकनीकी औपचारिकता नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का माध्यम है कि दर्ज की जा रही जानकारी किसी वास्तविक व्यक्ति द्वारा दी जा रही है। ओटीपी के सत्यापन के बाद व्यक्ति अपने राज्य, जिला और पते का चयन करता है, और यहीं से वह प्रशासनिक मानचित्र में अपनी उपस्थिति अंकित कर देता है ।
इसके बाद जो प्रक्रिया प्रारंभ होती है, वह वस्तुतः एक संवाद है, जिसमें सरकार नागरिक से उसके घर के बारे में प्रश्न पूछती है। यह प्रश्न केवल दीवारों और छतों तक सीमित नहीं होते, बल्कि घर में उपलब्ध सुविधाओं, जैसे बिजली, पानी, शौचालय, इंटरनेट, और अन्य संसाधनों तक फैल जाते हैं। लगभग तैंतीस प्रश्नों के माध्यम से एक घर का सामाजिक और आर्थिक स्वरूप उभरकर सामने आता है । यही वह क्षण है जहाँ एक साधारण नागरिक अनजाने में ही नीति निर्माण की नींव रख रहा होता है। सभी प्रश्नों के उत्तर वैकल्पिक उत्तरों सहित हैं।
जब सभी विवरण भर दिए जाते हैं, तब अंतिम चरण आता है, जिसे हम समापन नहीं, बल्कि एक नए भरोसे की शुरुआत कह सकते हैं। विवरण जमा करते ही एक विशेष पहचान संख्या मिलती है, जिसे एस ई आई डी कहा जाता है। यह संख्या केवल एक कोड नहीं, बल्कि उस परिवार की डिजिटल पहचान है। बाद में जब गणनाकर्मी घर पर आते हैं, तो केवल इसी आईडी के माध्यम से जानकारी का सत्यापन हो जाता है और पुनः विवरण देने की आवश्यकता नहीं रहती ।
इससे जनगणना कर्मी का समय और श्रम बचता है।
इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि स्व गणना पारंपरिक गणना का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक है। यदि कोई व्यक्ति यह प्रक्रिया नहीं करता, तो भी गणनाकर्मी घर आकर जानकारी एकत्र करेंगे। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं यह प्रक्रिया पूरी कर लेता है, वह न केवल समय बचाता है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को भी अधिक प्रभावी बनाता है ।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह पहल केवल सुविधा का विस्तार नहीं है, बल्कि एक व्यापक परिवर्तन का संकेत है। जनगणना के आंकड़े किसी देश की नीतियों, योजनाओं और संसाधनों के वितरण का आधार बनते हैं। इसलिए जब नागरिक स्वयं अपनी जानकारी दर्ज करता है, तो वह केवल एक फॉर्म नहीं भर रहा होता, बल्कि अपने भविष्य के विकास की दिशा तय कर रहा होता है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि लाखों परिवार इस डिजिटल प्रक्रिया में भागीदारी कर चुके हैं, जो इस परिवर्तन के प्रति समाज की स्वीकृति को दर्शाता है ।
इस प्रकार मकानों की गणना में स्व विवरण भरने की प्रक्रिया केवल तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस नए रूप का संकेत है जहाँ नागरिक और शासन के बीच दूरी कम हो रही है। अब दरवाजे पर दस्तक देने वाला गणनाकर्मी ही एकमात्र माध्यम नहीं रहा, बल्कि नागरिक स्वयं अपने अस्तित्व की कहानी लिखने लगा है। यही इस प्रक्रिया का सार है, जहाँ आंकड़े केवल संख्या नहीं रहते, बल्कि जीवन के विविध रंगों का प्रतिबिंब बन जाते हैं।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
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