काव्य :
पहचान
तुझे ढूंढता हूं हर पल
दिल से तेरी तलाश है
ढूंढा जिधर मिला नही
लगता तू आसपास है
मौन हो चली घंटियां
कहां खोया शंखनाद है
मुर्झाए फूल देहली पर
ठंडी दीप की आस है
भोगों में रस स्वाद नहीं
इत्र भी कहां सुवास है
थका नही अब भी मैं
नयनों में उमंग आस है
आओगे जरूर मन मेरे
मुरली की मधुर तान है
मुस्कान अधरों पर तेरे
मंदिर में उमंग रास है
जग कहता है ग्वाला
गोकुल की तू शान है
रुक्मणि का है स्वामी
राधा का वृंदा रास है
माथे केसर नाम तेरा
तू ही मेरी पहचान है।
- संदीप नेमा 'दीप', भोपाल
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