काव्य :
कलम और तू
बेकरार कलम
खो चुकी है तेरी
यादों में गुम
लिखने लगूँ कोई गीत
तो तेरी जुल्फों
के पेंचोखम में खो
जाती है
गजल तो मयकशी
तेरी नजरों से कर
महफिलों में झूम जाती है।
निगोड़ी कलम
माने ना
पलकद्वार खोलकर
दिल के दर
खटखटाए बिना
सीधे प्रवेश कर
धड़कनों के
तार झंकृत कर
नस-नस में मदहोशी
घोल जाती है।
तेरे चेहरे की
मासूमियत पर फिदा
कलम को
कायनात की सुंदरता
भी फीकी
लगती है और फिर
अनायास
तेरे कजरे की लहक,
लबों की दहक,
साँसों की महक
मेरे शब्दों में समाकर
खूबसूरत कविता
रचा जाती है।
- डा.नीलम , अजमेर
Tags:
काव्य
.jpg)
