लघुकथा :
खुशी
स्मिता कमरे की खिड़की पर उदास खडी थी| दिनभर की थकान और तनाव चेहरे पर स्पष्ट था| इतने में उसने देखा पडोस में रहने वाली श्रीमती माथुर बहुत सुंदर साडी, हाथ मे ब्रांडेड पर्स, हीरे के आभूषण पहने, अपने ड्रायवर के साथ शायद किसी पार्टी में जा रही थी|
बड़ा ही प्रभावशाली व्यक्तित्व है उनका| कितनी खुश लग रही थी|
अनजाने में ही वह अपनी तुलना श्रीमति माथुर से करने लगी| पडोस में रहनेवाली रंजना, वंदना, आशा, निशा, सभी से करने लगी| सभी कितनी खुश है|
विदेशों की सैर, रोज की किटि पार्टियाँ, घर में नौकर-चाकर| सुख-सुविधा से युक्त आराम-दायक जीवन|
मेरे भाग्य में वही ऑफिस रोज की वही उबानेवाली दिनचर्या, न कोई मनोरंजन न दिनचर्य में कोई बदलाव|
खुशी तू मुझसे इतनी दूर क्यो रहती है?
मै तुझे खोजती रहती हूँ, पर तू तो मेरे पास आती ही नही|
तभी उसके कानो में कोई धीरे से फुसफुसाया “मै तो तेरे आस-पास ही हूँ”| स्मिता ने इधर-उधर देखा, उसे कोई न दिखा, तभी फिर उसके कानो में आवाज आई “मै खुशी हूँ, मै तो तेरे इर्द-गिर्द ही हूँ|
तू मुझे बाहर खोजती है, पर मै तो तेरे अंदर ही हूँ| बताऊँ मै कहाँ हूँ|
“सूर्योदय की लालिमा मे हूँ, चाँदनी रात में हूँ
बसंत की प्यार मे हूँ, फूलो की बहार में हूँ
वर्षा की फुहार मे हूँ, शीतल जल-धार मे हूँ
नदियो की कलकल मे हूँ, झरनो के संगीत मे हूँ
सर्दी की गुनगुनी धूप में हूँ, सुगंधित मंद पवन में हूँ
बच्चो की मुस्कान में हूँ, शिशुओं की किलकारि में हूँ
बच्चों की प्रगति में हूँ, परिवार की तृप्ती में हूँ
मै तो यहीं हूँ तेरे साथ, पर तू मुझे ढूंढती है
ऊँचे भवन में, अमेरिका, इंग्लैंड में, जापान और फिनलैंड में
महँगी मोटर-कार में, हवाई-जहाज की सैर में.
तू मुझे बाहर खोजती है, पर मै तेरे अंदर हूँ
मै तेरे साथ लुका-छिपि खेल रही हूँ|
आ मुझे ढूंढ और गले लगा ले, और खिलखिलाकर हँस
क्यों कि स्मिता तेरा नाम है|”
“खुशी का कोई रास्ता नही है, खुश रहना ही रास्ता है”
- आरती चौगुले, पुणे
मो.नं.- 9850960735
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