लघु-कथा :
मदर्स डे
सुबह आँख खुली तो घडी मे देखा छ: बज रहे थे| आज रविवार था| छुट्टि थी, ऑफिस जाने की कोई जल्दी नही थी|
फिर भी आदत के अनुसार हाथ-मुँह धोकर रसोईघर मे चाय बनाने चली गई|
गैस पर चाय का पानी रखा ही था कि दो नन्हे-नन्हे हाथो ने पीछे से मेरे गले मे बाँहे डाल दी और खुशी से चीखकर बोली ‘हैप्पी मदर्स डे’ मम्मा|
आप को ‘मदर्स डे’ की बहुत-बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाए|
दोनो बेटियो के वे बोल मेरे कानो मे अमृत घोल रहे थे|
श्वेता और शुभ्रा दोनो को मैने अपने आलिंगन मे ले लिया और प्यार से उनके माथे को चूम लिया|
दोनो ने मुझे बडे प्यारे ग्रीटिंग-कार्ड दिये जो उन्होने खुद बनाये थे| कार्ड मे माँ के प्यार और ममता की सुंदर पंक्तियाँ लिखि हुइ थी|
ग्रीटिंग देखकर मै भाव-विभोर हो गई, तभी पीछे से समीर बोले अरे बच्चो, मम्मा को तुम्हारा उपहार भेट करो जो तुम लोग कल मेरे साथ ‘मॉल’ से लाये थे|
दोनो बेटियो ने मुझे प्यारासा गुलदस्ता और बहुत सुंदर सलवार-कमीज का ड्रेस, पेडेंट, ब्रेसलैट और इअरिंग भेट किये|
तभी समीर बोले ‘इन्हे पहनकर जल्दी से तैयार हो जाओ बच्चो को मै तैयार कर देता हूँ|’
आज का पूरा रविवार हम मौज मस्ती मे मनायेंगे| बाहर नाश्ता,खाना, सैर सपाटा कर के रात का खाना भी बाहर खायेंगे|
दोनों बेटियाँ बहुत खुश थी वे अपने पापा के साथ तैयार होने चली गई|
मै भी चाय पी कर तैयार होने लगी| मेरा मन अतीत मे भटक रहा था|
‘मदर्स डे’ के दिन मै हमेशा उदास रहती थी| मेरे जन्म के समय प्रसव मे ही माँ की मृत्यु हो गई थी|
मेरा जन्म मम्मी-पापा की शादी के पंद्रह साल बाद हुआ, इतने वर्षो बाद घर मे बच्चे के आगमन के समाचार से सब बहुत खुश थे|
मै गर्भ मे थी तभी मेरा नामकरण मेरी माँ ने कर दिया था|
यदि लडकी हुई तो ‘सुमेधा’ नाम रखेंगे, सुधा और सुधीर की बेटी और यदि बेटा हुआ तो ‘सुधांशु’
पापा बताते थे माँ बहुत खुश रहती थी| इतने वर्षो बाद उन्हे मातृत्व का सुख मिलने वाला था|
किंतु नियति का खेल अलग था| प्रसव के दौरान माँ की तबियत बिगड गई और डॉक्टरों के अथक प्रयत्नों के बावजूद माँ को नही बचाया जा सका|
जिस घर मे खुशियो के दीप जलने वाले थे वहाँ अंधेरा छा गया| जन्म लेते ही मै मनहूस, अपशकुनी आदि विशेषणो से विभूषित हो गई|
नानी-नाना और ननिहाल के सभी लोगो ने मेरा मुँह भी नही देखा| मेरे कारण उनकी बेटी संसार से विदा हो गई थी|
मेरे पापा और दादी-दादा ने मुझे बहुत प्यार से पाला| पापा विश्वविद्यालय मे रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे|
वह माँ और पिता दोनो के कर्तव्य अकेले ही कर रहे थे| दादा-दादी के बहुत आग्रह करने पर भी उन्होने दूसरी शादी नही की|
फिर भी मै जैसे जैसे बडी हो रही थी, मुझे घर में माँ की कमी महसूस होती थी| मेरी सभी सहेलियो की माताएँ अपनी बेटियो के बहुत लाड करती थी| मुझे लगता काश मेरी भी माँ होती|
एक बार कक्षा मे हिंदी की अध्यापिका ने ‘माँ’ पर निबंध लिखने को कहा था| सभी सहेलियो ने निबंध मे अपनी माँ के गुण-गान किये थे| उन पर कविताऍ लिखी थी और मै फूट-फूट के रोई थी|
पापा ने मुझे वह निबंध लिखवाया था| लिखवाते समय उनकी आँखो मे आँसू थे|
“छोटी है बेचारी, माँ नही है इसकी या मनहूस है जन्म लेते ही माँ को खा गई”| ऐसे दिल को चुभने वाले वाक्यो की मै अभ्यस्त हो गई थी|
कोई मुझे बेचारी कहे या मुझसे सहानुभूति रखे मुझे अच्छा नही लगता था|
मै अपना जन्म-दिन कभी भी आनंद से नही मना पाई क्योंकि, मेरा जन्म-दिन माँ का मृत्यु दिन था|
पापा मेरे जन्म-दिन पर मेरी सहेलियों को घर बुलाकर पार्टी देते, केक काटते, मेरे लिये नये कपडे, मिठाइयाँ लाते, बाहर घुमाने ले जाते|
पापा की सभी इच्छाओ का, आशाओ का केंद्रबिंदु मै ही थी| मुझे प्रसन्न रखने का हर संभव प्रयत्न वे करते फिर भी मै उदास रहती|
जैसे जैसे मै बड़ी हो रही थी, माँ की मृत्यु के लिये मै स्वयं को दोषी समझती थी|
पापा और दादी मुझे समझाते “बेटी, इसमें तुम्हारा कोई दोष नही है|” ये तो जीवन के उतार-चढाव है| तुम स्वयं को अपराध-बोध से मुक्त कर दो|
मै पंद्रह वर्ष की थी तब बुआजी जो अमेरिका मे रहती थी भारत आई और आते ही बोली अरे “सुमी तो सुधा की ही प्रतिमूर्ति है”| उसके हँसने, बोलने का ढंग यहॉ तक कि आवाज भी सुधा जैसी है|
मैने स्वयं को दर्पण में निहारा, मेरे हँसने बोलने का ढंग माँ जैसा है यह मुझे पहली बार पता चला|
माँ के जन्म-दिन, मृत्यु-दिन और ‘मदर्स डे’ पर मै उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण करती थी, पुष्प चढाती थी|दीपक और अगरबत्ती जलाकर नमन-वंदन कर के आशिर्वाद लेती थी| समय का चक्र अपनी गति से चल रहा था| मै बडी हो गई| मेरी पढाई पूरी करने के बाद मुझे एक अच्छी कंपनी मे नौकरी मिल गई|
पापा मेरा विवाह किसी सुयोग्य वर के साथ कर के अपने उत्तरदायित्व को पूरा करना चाहते थे|
मेरी शादी समीर के साथ तय कर दी| समीर एक बडी मल्टी-नेशनल-कंपनी मे उच्च पदाधिकारी है|
शादी के दस-वर्षो मे मै दोन नन्ही-प्यारी बेटियो की माँ बन गई| पूरा घर उनकी हँसी-खिलखिलाहट से गूँज उठता है|
जब वह ‘मम्मा’ कहकर मुझसे लिपट जाती है तो सारे जहॉ का सुख मै अपनी झोली में अनुभव करती हूँ|
मेरा मातृत्व खिल उठता है|
मुझे तो माँ का प्यार नहीं मिला लेकिन मै अपनी बेटियों पर अपना संपूर्ण प्यार और ममता लुटाकर अपने माँ होने का गौरव अनुभव करती हूँ|
सभी माताओं को मातृ-दिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ|
- आरती चौगुले,पुणे (मो.9850960735)
.jpg)
