ad

लघु-कथा : मदर्स डे - आरती चौगुले,पुणे


 

लघु-कथा : 

मदर्स डे

सुबह आँख खुली तो घडी मे देखा छ: बज रहे थे| आज रविवार था| छुट्टि थी, ऑफिस जाने की कोई जल्दी नही थी|

फिर भी आदत के अनुसार हाथ-मुँह धोकर रसोईघर मे चाय बनाने चली गई|

गैस पर चाय का पानी रखा ही था कि दो नन्हे-नन्हे हाथो ने पीछे से मेरे गले मे बाँहे डाल दी और खुशी से चीखकर बोली ‘हैप्पी मदर्स डे’ मम्मा|

आप को ‘मदर्स डे’ की बहुत-बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाए|

दोनो बेटियो के वे बोल मेरे कानो मे अमृत घोल रहे थे|

श्वेता और शुभ्रा दोनो को मैने अपने आलिंगन मे ले लिया और प्यार से उनके माथे को चूम लिया|

दोनो ने मुझे बडे प्यारे ग्रीटिंग-कार्ड दिये जो उन्होने खुद बनाये थे| कार्ड मे माँ के प्यार और ममता की सुंदर पंक्तियाँ लिखि हुइ थी| 

ग्रीटिंग देखकर मै भाव-विभोर हो गई, तभी पीछे से समीर बोले अरे बच्चो, मम्मा को तुम्हारा उपहार भेट करो जो तुम लोग कल मेरे साथ ‘मॉल’ से लाये थे|

दोनो बेटियो ने मुझे प्यारासा गुलदस्ता और बहुत सुंदर सलवार-कमीज का ड्रेस, पेडेंट, ब्रेसलैट और इअरिंग भेट किये|

तभी समीर बोले ‘इन्हे पहनकर जल्दी से तैयार हो जाओ बच्चो को मै तैयार कर देता हूँ|’

आज का पूरा रविवार हम मौज मस्ती मे मनायेंगे| बाहर नाश्ता,खाना, सैर सपाटा कर के रात का खाना भी बाहर खायेंगे|

दोनों बेटियाँ बहुत खुश थी वे अपने पापा के साथ तैयार होने चली गई|

मै भी चाय पी कर तैयार होने लगी| मेरा मन अतीत मे भटक रहा था|

‘मदर्स डे’ के दिन मै हमेशा उदास रहती थी| मेरे जन्म के समय प्रसव मे ही माँ की मृत्यु हो गई थी|

मेरा जन्म मम्मी-पापा की शादी के पंद्रह साल बाद हुआ, इतने वर्षो बाद घर मे बच्चे के आगमन के समाचार से सब बहुत खुश थे|

मै गर्भ मे थी तभी मेरा नामकरण मेरी माँ ने कर दिया था|

यदि लडकी हुई तो ‘सुमेधा’ नाम रखेंगे, सुधा और सुधीर की बेटी और यदि बेटा हुआ तो ‘सुधांशु’

पापा बताते थे माँ बहुत खुश रहती थी| इतने वर्षो बाद उन्हे मातृत्व का सुख मिलने वाला था|

किंतु नियति का खेल अलग था| प्रसव के दौरान माँ की तबियत बिगड गई और डॉक्टरों के अथक प्रयत्नों के बावजूद माँ को नही बचाया जा सका|

जिस घर मे खुशियो के दीप जलने वाले थे वहाँ अंधेरा छा गया| जन्म लेते ही मै मनहूस, अपशकुनी आदि विशेषणो से विभूषित हो गई|

नानी-नाना और ननिहाल के सभी लोगो ने मेरा मुँह भी नही देखा| मेरे कारण उनकी बेटी संसार से विदा हो गई थी|

मेरे पापा और दादी-दादा ने मुझे बहुत प्यार से पाला| पापा विश्वविद्यालय मे रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे|

वह माँ और पिता दोनो के कर्तव्य अकेले ही कर रहे थे| दादा-दादी के बहुत आग्रह करने पर भी उन्होने दूसरी शादी नही की|

फिर भी मै जैसे जैसे बडी हो रही थी, मुझे घर में माँ की कमी महसूस होती थी| मेरी सभी सहेलियो की माताएँ अपनी बेटियो के बहुत लाड करती थी| मुझे लगता काश मेरी भी माँ होती|

एक बार कक्षा मे हिंदी की अध्यापिका ने ‘माँ’ पर निबंध लिखने को कहा था| सभी सहेलियो ने निबंध मे अपनी माँ के गुण-गान किये थे| उन पर कविताऍ लिखी थी और मै फूट-फूट के रोई थी| 

पापा ने मुझे वह निबंध लिखवाया था| लिखवाते समय उनकी आँखो मे आँसू थे|

“छोटी है बेचारी, माँ नही है इसकी या मनहूस है जन्म लेते ही माँ को खा गई”| ऐसे दिल को चुभने वाले वाक्यो की मै अभ्यस्त हो गई थी|

कोई मुझे बेचारी कहे या मुझसे सहानुभूति रखे मुझे अच्छा नही लगता था|

मै अपना जन्म-दिन कभी भी आनंद से नही मना पाई क्योंकि, मेरा जन्म-दिन माँ का मृत्यु दिन था|

पापा मेरे जन्म-दिन पर मेरी सहेलियों को घर बुलाकर पार्टी देते, केक काटते, मेरे लिये नये कपडे, मिठाइयाँ लाते, बाहर घुमाने ले जाते|

पापा की सभी इच्छाओ का, आशाओ का केंद्रबिंदु मै ही थी| मुझे प्रसन्न रखने का हर संभव प्रयत्न वे करते फिर भी मै उदास रहती|

जैसे जैसे मै बड़ी हो रही थी, माँ की मृत्यु के लिये मै स्वयं को दोषी समझती थी|

पापा और दादी मुझे समझाते “बेटी, इसमें तुम्हारा कोई दोष नही है|” ये तो जीवन के उतार-चढाव है| तुम स्वयं को अपराध-बोध से मुक्त कर दो|

मै पंद्रह वर्ष की थी तब बुआजी जो अमेरिका मे रहती थी भारत आई और आते ही बोली अरे “सुमी तो सुधा की ही प्रतिमूर्ति है”| उसके हँसने, बोलने का ढंग यहॉ तक कि आवाज भी सुधा जैसी है|

मैने स्वयं को दर्पण में निहारा, मेरे हँसने बोलने का ढंग माँ जैसा है यह मुझे पहली बार पता चला|

माँ के जन्म-दिन, मृत्यु-दिन और ‘मदर्स डे’ पर मै उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण करती थी, पुष्प चढाती थी|दीपक और अगरबत्ती जलाकर नमन-वंदन कर के आशिर्वाद लेती थी| समय का चक्र अपनी गति से चल रहा था| मै बडी हो गई| मेरी पढाई पूरी करने के बाद मुझे एक अच्छी कंपनी मे नौकरी मिल गई|

पापा मेरा विवाह किसी सुयोग्य वर के साथ कर के अपने उत्तरदायित्व को पूरा करना चाहते थे|

मेरी शादी समीर के साथ तय कर दी| समीर एक बडी मल्टी-नेशनल-कंपनी मे उच्च पदाधिकारी है|

शादी के दस-वर्षो मे मै दोन नन्ही-प्यारी बेटियो की माँ बन गई| पूरा घर उनकी हँसी-खिलखिलाहट से गूँज उठता है|

जब वह ‘मम्मा’ कहकर मुझसे लिपट जाती है तो सारे जहॉ का सुख मै अपनी झोली में अनुभव करती हूँ|

मेरा मातृत्व खिल उठता है|

मुझे तो माँ का प्यार नहीं मिला लेकिन मै अपनी बेटियों पर अपना संपूर्ण प्यार और ममता लुटाकर अपने माँ होने का गौरव अनुभव करती हूँ|

सभी माताओं को मातृ-दिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ|

- आरती चौगुले,पुणे (मो.9850960735)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post