घर की पहली शिक्षक: माँ और बदलता पालन-पोषण
- डॉ. सत्यवान सौरभ, भिवानी
माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन की सबसे गहरी अनुभूति है। संसार में बच्चे की पहली पहचान, पहला स्पर्श, पहला भरोसा और पहली शिक्षा माँ से ही शुरू होती है। किसी भी समाज की सभ्यता और संवेदनशीलता इस बात से आँकी जा सकती है कि वहाँ मातृत्व को कितना सम्मान और महत्व दिया जाता है। आधुनिक समय में भले ही शिक्षा के बड़े-बड़े संस्थान, डिजिटल तकनीक और करियर की दौड़ ने जीवन की दिशा बदल दी हो, लेकिन आज भी यह सत्य उतना ही मजबूत है कि बच्चे की पहली शिक्षक उसकी माँ ही होती है।
बच्चा जब जन्म लेता है, तब वह इस दुनिया की भाषा नहीं जानता। वह शब्दों को नहीं समझता, लेकिन भावनाओं को महसूस करता है। माँ की गोद में उसे सुरक्षा मिलती है, उसके स्पर्श में अपनापन और उसकी आवाज़ में विश्वास मिलता है। यही वह शुरुआती शिक्षा है जो किसी किताब या स्कूल में नहीं मिलती। माँ बच्चे को केवल चलना या बोलना नहीं सिखाती, बल्कि जीवन को समझना भी सिखाती है। प्यार क्या होता है, दूसरों का सम्मान कैसे करना चाहिए, दुख में धैर्य कैसे रखना चाहिए और रिश्तों को कैसे निभाना चाहिए—इन सबका पहला पाठ घर में माँ ही पढ़ाती है।
विद्यालय बच्चों को विज्ञान, गणित और भाषा सिखाते हैं, लेकिन नैतिक मूल्य घर से आते हैं। बच्चा अपनी माँ के व्यवहार को रोज़ देखता है। वह देखता है कि माँ पूरे परिवार की ज़रूरतों का ध्यान कैसे रखती है, बिना थके हर सदस्य की चिंता कैसे करती है और अपने हिस्से की इच्छाओं का त्याग करके परिवार को प्राथमिकता कैसे देती है। यही दृश्य बच्चे के भीतर संवेदनशीलता, सहानुभूति और जिम्मेदारी की भावना पैदा करते हैं। बच्चा बोलने से पहले देखना सीखता है और वही देखी हुई बातें उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं।
माँ बच्चे के चरित्र निर्माण की सबसे बड़ी आधारशिला होती है। यदि घर का वातावरण प्रेमपूर्ण और सम्मानजनक होगा, तो बच्चा भी समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करेगा। यदि माँ दूसरों के प्रति दया और सहानुभूति दिखाती है, तो बच्चा भी वही सीखता है। यही कारण है कि समाज की वास्तविक शिक्षा घरों में होती है, स्कूलों में केवल उसका विस्तार होता है।
लेकिन बदलते समय के साथ पालन-पोषण का स्वरूप भी बदल रहा है। आज की दुनिया पहले जैसी नहीं रही। महंगाई, करियर की प्रतिस्पर्धा और आधुनिक जीवनशैली ने परिवारों की संरचना और रिश्तों के स्वरूप को प्रभावित किया है। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चे दादा-दादी, चाचा-चाची और पूरे परिवार के बीच बड़े होते थे। अब अधिकांश परिवार छोटे हो गए हैं। माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और बच्चों के साथ बिताने का समय सीमित होता जा रहा है।
विशेष रूप से कामकाजी माताओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है—करियर और मातृत्व के बीच संतुलन बनाना। समाज अक्सर यह मान लेता है कि यदि माँ घर से बाहर काम कर रही है तो वह बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रही होगी। लेकिन यह सोच अधूरी है। आज की माँ केवल घर संभालने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आर्थिक जिम्मेदारियाँ भी निभा रही है। वह ऑफिस में काम करती है, घर लौटकर बच्चों की देखभाल करती है और परिवार की भावनात्मक जरूरतों को भी पूरा करती है। यह दोहरी जिम्मेदारी आसान नहीं है।
कई बार कामकाजी माताएँ अपराधबोध का शिकार हो जाती हैं कि वे अपने बच्चों को उतना समय नहीं दे पा रहीं जितना देना चाहिए। लेकिन पालन-पोषण केवल समय की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि उस समय की गुणवत्ता से तय होता है। यदि माँ सीमित समय में भी बच्चों के साथ संवाद करती है, उनकी भावनाओं को समझती है और सही संस्कार देती है, तो उसका प्रभाव गहरा होता है।
आज के बच्चे पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर हो रहे हैं। माता-पिता के व्यस्त रहने के कारण वे अपने छोटे-छोटे काम स्वयं करना सीख रहे हैं। वे समय का प्रबंधन करना, अकेले रहना और बदलते परिवेश में खुद को ढालना सीख रहे हैं। कई बच्चे अकेले समय में नई रचनात्मक गतिविधियों की ओर भी बढ़ रहे हैं। यह बदलाव सकारात्मक भी हो सकता है, यदि बच्चों को सही दिशा और भावनात्मक सहयोग मिलता रहे।
लेकिन इस बदलते पालन-पोषण के कुछ खतरे भी हैं। आज तकनीक ने बच्चों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट बच्चों के जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। कई बार माता-पिता की व्यस्तता बच्चों को भावनात्मक रूप से अकेला कर देती है। बच्चे अपनी समस्याएँ साझा करने के बजाय डिजिटल दुनिया में खोने लगते हैं। ऐसे समय में माँ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे केवल बच्चों की पढ़ाई या भोजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके मन की स्थिति को भी समझना चाहिए।
बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत संवाद की होती है। यदि माँ बच्चे से खुलकर बात करती है, उसकी परेशानियों को सुनती है और बिना डर के अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का माहौल देती है, तो बच्चा मानसिक रूप से मजबूत बनता है। लेकिन यदि घर में संवाद खत्म हो जाए, तो बच्चा अंदर ही अंदर अकेलापन महसूस करने लगता है। यही अकेलापन आगे चलकर तनाव, अवसाद और व्यवहारिक समस्याओं का कारण बन सकता है।
दुर्भाग्य से आधुनिक समाज में मातृत्व को लेकर भी एक कृत्रिम छवि बनाई जा रही है। सोशल मीडिया पर “परफेक्ट माँ” की तस्वीरें दिखाई जाती हैं—जो हमेशा मुस्कुराती रहती है, हर काम बिना थके करती है और कभी परेशान नहीं होती। लेकिन वास्तविक जीवन इससे अलग है। माँ भी इंसान है। उसकी भी अपनी थकान, परेशानियाँ और भावनाएँ हैं। इसलिए मातृत्व को केवल त्याग और बलिदान की मूर्ति बनाकर देखना उचित नहीं है। माँ को भी भावनात्मक सहयोग, सम्मान और विश्राम की आवश्यकता होती है।
भारतीय संस्कृति में माँ को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है। “मातृ देवो भवः” केवल एक धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक जीवन का मूल दर्शन है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस माँ को सम्मान का प्रतीक माना जाता है, उसी के श्रम को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है। घर का काम, बच्चों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारियाँ आज भी “काम” नहीं मानी जातीं। यह सोच बदलनी होगी। बच्चों को बचपन से यह सिखाना होगा कि माँ का श्रम केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि वे मातृत्व को सहयोग देने वाली नीतियाँ बनाएं। कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, पर्याप्त मातृत्व अवकाश, डे-केयर सुविधाएँ और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं। क्योंकि यदि माँ तनाव और असुरक्षा में रहेगी, तो उसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ेगा।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि माँ केवल बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि उसके व्यक्तित्व को गढ़ती है। वह बच्चे की पहली पाठशाला है, जहाँ से जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है। उसकी गोद में बच्चा केवल अक्षर नहीं, बल्कि इंसानियत सीखता है। वह सिखाती है कि रिश्तों की कीमत क्या होती है, दूसरों के लिए त्याग कैसे किया जाता है और कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद कैसे बनाए रखी जाती है।
आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब भी माँ का महत्व कम नहीं हुआ है। बल्कि बदलते समय में उसकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। क्योंकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यदि कोई रिश्ता बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक दिशा और निस्वार्थ प्रेम दे सकता है, तो वह केवल माँ का रिश्ता है। इसलिए यह सच आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि घर की पहली शिक्षक माँ ही होती है और उसके दिए संस्कार जीवनभर बच्चे के व्यक्तित्व की नींव बने रहते हैं।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)
.jpg)
