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कहानी : माँ… कहतीं तो.. - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल


 

कहानी : 

माँ… कहतीं तो.. 

"मम्मी जी आपकी यह जिंदादिली मुझे आपका दीवाना बना लेगी। आप को पाकर मैं अपनी जिंदगी में एक नई बहार महसूस करने लगी हूँ।"  मीरा ने हुलस कर अपनी सास के गले में बाहें डाल दीं।

"हाँ मीरा तुम्हारा साथ मुझे भी बहुत अच्छा लगता है, मेरे तो दोनों ही बेटे हैं... उनसे बातें तो खूब होती हैं,  मैं उनकी दोस्त बनना चाहती हूँ , पर वो बात नहीं है। तुमसे मिलकर मुझे लगा कि बेटी बेटे से बढ़कर होती है। और वह ज्यादा अच्छी दोस्त हो सकती है।" मीरा की सास मंजू ने कुछ गंभीरता से कहा ।

  " पर मम्मी जी मैं तो अपनी माँ की इकलौती बेटी हूँ  फिर भी मेरी माँ तो ऐसी नहीं है?  वे तो कभी मेरी दोस्त  नहीं रहीं। मेरी और माँ की आदतों में बहुत अंतर है।उनका स्वभाव मुझसे बिल्कुल अलग है, वे हमेशा संतुलित व्यवहार करती हैं।  मेरे साथ हर जगह जाती तो हैं पर खामोशी ओढ़े रहती हैं, ऐसे खुलकर हंसते बात करते तो मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं।"  मीरा ने शिकायती लहजे में कहा।

"हाँ! मैंने भी महसूस किया है कि वे बहुत कम बोलती हैं, हंसने की बात पर भी सिर्फ मुस्कुरा देती हैं।" मंजु कुछ सोचते हुए बोली। कुछ रुककर वे पुनः बोली

" बेटी क्या तुमने कभी अपनी माँ के व्यक्तित्व के बारे में जानने की कोशिश की, कभी उनके सपने, उनके बचपन के बारे में या अपनी जिंदगी में, वे क्या चाहती हैं... कभी तुमने जानने की कोशिश की है।"

"नहीं मम्मी जीमेरी माँ तो बहुत शांत स्वभाव की हैं। ज्यादा बात नहीं करतीं, अपने काम से काम रखती हैं, खाली समय में किताबों में डूबी रहती हैं।" मीरा ने जवाब दिया।

"वही तो... तुमने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की कि उनका जीवन कैसा था या उनके सपने क्या थे ? क्या वे सिर्फ तुम्हारी माँ, तुम्हारे पिता की पत्नी और सास ससुर की बहू ही बनी रहना चाहती थीं या कुछ और भी चाहती थीं।"

"नहीं मम्मी जी! मैं ने तो उन्हें हमेशा दादा, दादी ,बुआ ,चाचा और पापा के लिए एक टांग पर खड़ा ही पाया है।" मीरा ने कुछ असमंजस से कहा।

"इस बार जाओ तो अपनी माँ से उनके सपनों के बारे में पूछना।" कहकर मम्मी जी उठ गई।

      मीरा हतप्रभ रह गयी। उस रात वह सो न सकी।  मम्मी जी की बातें बार-बार उसके जेहन  पर चोट करती रहीं। क्या माँ के भी कुछ सपने होंगे? उनकी खामोशी का कारण कहीं उनके अधूरे स्वप्न ही तो नहीं, क्या सच में वे अपनी जिंदगी से कुछ और चाहती रही  हैं ,क्या उन्होंने हालात के आगे घुटने टेक दिए थे? तरह तरह के सवाल उसे परेशान करते रहे। वह बेचैनी से रात भर करवटें बदलती रही ।

       अगले ही दिन वह अपने मायके पहुँच गयी। उसे अचानक आया देख उसकी माँ नेहा के चेहरे पर चमक उभरी फिर लुप्त हो गई।मीरा सोचने लगी -  माँ ऐसी क्यों है कभी खुलकर क्यों नहीं मिलती जैसे मम्मी जी तो बात बात पर हंसती हैं , पर माँ तो जैसे हमेशा एक खोल में समाई रहती हैं , ऐसा नहीं है कि वे मुझे प्यार नहीं करतीं पर कभी दर्शाती  नहीं हैं, अभी मैं आई हूँ तो झटपट मेरे लिए तरह तरह के खाने बनाने में जुट जाएंगी। एक दो  वाक्यों में मेरा हाल-चाल पूछ कर काम करने लगेंगी। मुझे तो पापा ही कंपनी देते हैं। जब से मम्मी जी का साथ मिला है , मैं अक्सर उनकी तुलना अपनी माँ से करने लगी हूँ। वैसे वे मुझे बहुत प्यार करती हैं, मेरी हर चीज का ध्यान रखती हैं , शापिंग भी वही कराती हैं पर उनकी वह जगह नहीं बन पाई,जो इतने कम समय में मम्मी जी की बन गई है। एक अनजाना सा फासला है हम दोनों के बीच, मैं उन्हें कभी अपनी दोस्त जैसा महसूस ही नहीं कर पाई। इसीलिए शायद मैं पापा के ज्यादा करीब थी अपनी हर बात मैं पापा से ही शेयर करती, अनूप से शादी का इरादा भी मैं ने पहले पापा से ही शेयर किया था। 

        माँ को जब पता चला तो वे चिंतित हो उठीं। अगले ही दिन पापा के साथ अनूप के घर पहुँच गई। मम्मी जी की सारी बातें खामोशी से सुनती रहीं। वे चाय बनाने उठी तो माँ भी उनके साथ अंदर चली गई।

   घर आईं तो पापा बरस पड़े - तुम बेटी की शादी की बात करने गयी थी या उनकी रसोइया बनने। माँ कुछ नहीं बोलीं मुस्कुरा कर रह गई थी। शायद वे अनूप के रहन-सहन को देखना चाहती थीं, उनके चेहरे पर छाई चिंता की लकीरें मिट गयी थीं , एक इत्मीनान आ गया था। एसी बहुत सी बातें थीं, जिनसे उनका प्यार झलकता  पर वे कभी जाहिर नहीं करती।

  "अरे मीरा तुम कब आईं, वह भी सुबह सुबह...."  पापा ने घर में घुसते हुए पूछा।

  "कहाँ थे पापा आप... कब से इंतजार कर रही हूँ।" मीरा उन्हें देख कर खुश हो गई।

"क्यों तुम्हारी माँ कहाँ गयी...  घुस गयी होगी किचन में... तुम्हारी मनपसंद चीजें बनाने के लिए... " कह कर पापा हंस पड़े।

" पापा एक बात बताइए मम्मी क्या हमेशा से ही ऐसी हैं?" मीरा ने पूछा।

"क्या मतलब? कैसी हैं ?”

"पापा! जब  वो शादी करके आईं थीं तब भी इतनी ही खामोश रहती थीं?"  मीरा ने अपनी बात स्पष्ट की।

  "नहीं बेटा... जब शादी होकर आई थी तब तो बात बात पर हंसती खिल खिलाती रहती थी, फिर धीरे धीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले सब कुछ भूल गयी। मेरे हालात भी तब ठीक नहीं थे, घर में दो छोटे भाई-बहन थे, उनकी पढ़ाई लिखाई, उनकी  शादी , तुम्हारे दादा दादी की जिम्मेदारी... बस वह  रसोई में कैद होकर रह गई। खैर छोड़ो... यह बताओ आज अपनी सास को छोड़कर यहाँ कैसे?"

" कुछ नहीं पापा! यूँ ही आप लोगों से मिलने का मन हो आया,तो चली आई।"

"पर मुझे तो आज बहुत जरूरी मीटिंग में जाना है... चलो तुम कुछ खा पी लो तो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ता हुआ निकल जाऊँगा।" पापा बोले ।

  " नहीं पापा आप जाइए मैं तो आज वैसे भी माँ से ही मिलने आई हूँ।" मीरा ने हंसकर कहा ।

   "अरे वाह पापा की बेटी आज माँ की बेटी बन गई है।" पापा  हो हो कर हंस पड़े। मीरा भी हंसने लगी। तभी माँ आ गईं।

"क्या बात है बाप बेटी में क्या चल रहा है बड़ी हंसी आ रही है... चलिए आ जाइए खाना तैयार है।"

      टेबल खूब सजी  थी। मीरा अपना मनपसंद खाना देख, माँ के गले में हाथ डाल कर उनसे लिपट गई।

"वाह माँ! तुम कितनी अच्छी हो।"

"चल चल… अपनी सासू माँ के साथ रहकर यह  लिपटना विपटना  खूब सीख  गई है।"  नेहा हंस कर बोली ।

     थोड़ी देर बाद मीरा के पापा निकल गए , अब घर में सिर्फ माँ बेटी ही रह गई थीं। माँ ने ऊन की सलाई उठाते हुए कहा

" चलो थोड़ा धूप में बैठते हैं।"

"माँ! जब आप छोटी थीं  तो क्या-क्या सपने देखा करती थीं ?" मीरा ने अचानक पूछा।

"सपने..." नेहा  ने चौंक कर  मीरा की ओर देखा।

" हाँ माँ… जब आप छोटी थीं तो आप क्या सोचती थीं? आप अपने जीवन में क्या बनना चाहती थीं... प्लीज मुझे बताइए ना।" 

    इस बार वे  मुस्कुरा पड़ीं  और बोलीं -" सपने तो हर कोई देखता है पर हालात के आगे सब मिट जाते हैं।”

" ओह माँ...  बताओ ना... " मीरा ने मचल कर कहा।

" सपने… सपने… हम जैसे लोगों के सपने कोई मायने नहीं रखते।"

" फिर भी माँ! तुम ने कुछ तो सोचा होगा कुछ तो चाहा होगा अपनी जिंदगी में... तुम्हारे कुछ तो सपने होंगे माँ प्लीज़ बताओ ना... " मीरा ने चिरौरी की ।

"आज तुम्हें क्या सूझी पहले तो कभी नहीं पूछा? " नेहा ने पलट कर पूछा।

" बस माँ बताओ ना..."

" बेटा सपने तो बहुत देखे थे पर तुम्हारे नाना नानी की माली हालत अच्छी नहीं थी, कम उम्र में ही शादी कर दी, यहाँ आई तो यहाँ भी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। काम का बोझ पड़ा, जिम्मेदारियाँ भी धीरे-धीरे बढ़ने लगी। सारे सपने धूल  में मिल गए और नून तेल लकड़ी में जिंदगी उलझ कर रह गई।" नेहा ने मायूसी से कहा।

"फिर भी माँ ठीक से  बताओ ना।"  मीरा ने फिर पूछा 

"कुछ खास नहीं है बेटा... मेरी जिंदगी में...  कभी सोचने का वक्त ही नहीं मिला न ही किसी ने पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ ।" कह कर वे खामोश हो गईं । 

     मीरा चुपचाप अपनी माँ का मुँह देखती रही। उसके चेहरे पर सवालों की झड़ी लगी थी। धीरे-धीरे नेहा ने अपने अतीत के पन्ने पलटने शुरू किए।

 मीरा हतप्रभ उनकी बातें सुनती रही, सुनाते सुनाते वे कभी हंस पड़ती तो कभी उनकी आंखें भर आतीं। काफी देर बाद काम वाली  के आने से सभा भंग हुई।

"पहली बार किसी ने मेरे मन की बातें सुनी है, मन पर चढ़ा बोझ कुछ हल्का हुआ।" कहकर वे खड़ीं हो गई।

"माँ आज मैंने भी तुम्हें पहली बार जाना कि तुम्हारे भी कुछ सपने थे।"  कहकर वह एक बार फिर माँ  से लिपट गई और उन्हें चूम  लिया, नेहा ने भी उसे लिपटा लिया ।

"माँ अब मुझे चलना चाहिए आज  आपसे बात कर मुझे बहुत अच्छा लगा।" मीरा ने अधीर होकर कहा। 

माँ  मुस्कुराई -"आज तो मेरा  मन  भी हल्का हो गया।" 

    मीरा अपने घर के लिए निकल पड़ी। रास्ते में सोचने लगी, मैंने तो कभी जानना ही नहीं चाहा और न ही कभी उन्हें समझा।  माँ ने तो जीवन में बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं, तभी तो वह इतनी खामोश रहती हैं। बहुत कुछ दबा है उनके भीतर, उसे बाहर लाना होगा।

  जाहिर है माँ से सभी बातें एक बार में तो हो नहीं सकती थीं  लेकिन धीरे-धीरे उसने माँ को कुरेदना शुरू किया अक्सर  दोपहर में वह माँ के पास जाने लगी। पहले तो वे हिचकतीं पर धीरे-धीरे खुलने लगीं। उनके अंदर का गुबार हौले हौले बाहर आने लगा। वे खुश रहने लगीं।खूब बातें भी करने लगीं थीं।

"क्या बात है बेटा! आजकल तुम अपनी माँ के पास बहुत जाने लगी हो?” एक दिन सास ने पूछ लिया।

  "जी मम्मी जी! मैं अपनी माँ को समझने की कोशिश कर रही हूँ जैसा कि आपने कहा था।" मीरा ने जवाब दिया।

"सब ठीक तो है ना? तुम ने पूछा... अपनी माँ से ?

"जी मम्मी जी! माँ तो अब बहुत बदल गई हैं । मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा कि हमेशा शांत और चुप रहने वाली ये मेरी वही माँ है। आप ने सच कहा था उन्हें जानने या समझने की कोशिश तो किसी ने की ही नहीं। पता है मम्मी जी! वे बहुत सुंदर चित्र बनाती हैं और कहानियाँ भी लिखती हैं।"

"अरे वाह! मुझे भी दिखाना कभी... तुम्हारे पापा को मालूम है क्या उनके इस टैलेंट के बारे में?

"नहीं उन्होंने कभी बताया ही नहीं और पापा को भी कहाँ फुर्सत है वे तो अपने बिजनेस में ही डूबे रहते हैं।

"चलो कोई बात नहीं!  देर आए दुरुस्त आए, तुम ने तो समझा उन्हें।

" जी मम्मी जी अब तो वे हमेशा खुश रहती हैं । मम्मी जी... अब उनके अंदर की मशीन गायब हो चुकी है, वे भी इंसान बन गई हैं , हंसती हैं , खिलखिलाती हैं ।  वे बहुत बदल गई हैं।” मीरा बहुत खुश थी।

"वाह यह तो कमाल हो गया। मुझे सुनकर बहुत अच्छा लगा। इस होली पर उन्हें अपने यहाँ बुलाओ... अब उनके अंदर के संकोच को भी तो हमें बाहर लाना है न।"

" जी मम्मी जी ठीक कहा आपने… अभी भी वे सबसे बात करने में कतराती हैं। मैं जरूर उन्हें बुलाऊंगी।" मीरा चहक कर बोली।

       मम्मी जी के साथ अपनी माँ को होली खेलते देख मीरा की खुशी का ठिकाना न रहा। उस वक्त तो वह और भी हैरान रह गई जब मम्मी जी ने हाथ पकड़ कर उसकी माँ को भी खींच लिया और वे दोनों ही डांस करने लगीं ।

        मीरा सोचने लगी मेरी सास की एक बात ने मुझे मेरी माँ से मिलवा दिया और उन्हें मेरी दोस्त बना दिया। मेरी सास ने मुझे ऐसा अनमोल उपहार दिया है जो  कोई नहीं दे सकता। उन्होंने हम माँ बेटी को इतना करीब ला दिया, जितना हम पहले कभी नहीं थे।सोचते सोचते उसकी आंखें नम हो गईं।

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 - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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