काव्य :
ग़ज़ल
ना जाने कितने हुनर दिखाते हैं,
तब जाकर कहीं खूब कमाते हैं,
ना जाने क्यों ज्यादा ऊँचाइयों पर,
खतरे भी ज्यादा नज़र आते हैं,
बस यही सोचकर हम हमेशा,
नीचे के नीचे ही रह जाते हैं,
जिन्हें आदत है फकीरी में जीने की,
उन्हें महल भी नहीं सुहाते हैं,
सूरज से रोशनी होती है जहान में,
"विनय"अंधेरे में चाँद चमक जाते हैं,
- विनय चौरे , इटारसी
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