काव्य :
मलयानिल सी श्वास
लबों के प्याले
लबों से टकरा गये
सदियों की सोई
प्यासी प्रीत
ऊर में जगा गये
टकराई जब साँसें
साँसों से
मलयानिल सी साँसें
कर गये।
चराग से
जलने-बुझने लगे
इश्क की राहों में
तन थरथरा कर
रह गये,
यक- ब- यक तार
धड़कनों में
बज उठे,ख्वाब बिन
पंख के उड़ने लगे।
तन बेसुध
रुह कंजरी होकर
दिल के गलियारों में
नाचने लगी
पलकों की छाँव तले
सपनो ने
खटिया बिछा ली।
- डा.नीलम ,अजमेर
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