काव्य :
बुत फटकारने लगे
सारे फरिश्ते मिल के मुझे मारने लगे।
जो एक का न हुआ तो धिक्कारने लगे ।।
ऊपर तो सभी एक थे नीचे अलग अलग।
पत्तो की सींच कहके मुझे डांटने लगे ।।
नहीं किया सलाम तो उनको बुरा लगा।
नाराज होके मेरी जड़े काटने लगे ।।
बाहर लगी है आग तो अन्दर धुंआ भरा।
मौतों में सरल मौत को हम छांटने लगे ।।
दीवार हैं कांटे भरी और सिकुड़ रहीं हैं।
पेश्तर मरने के बुज फटकारने लगे ।।
- डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव
छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)
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