काव्य :
नारी का हर रूप
कैसे विधाता ने गढ़ा है,
अद्भुत सा हर नारी का रूप।
कभी शांत, शीतल सरिता जैसी,
दुष्टों हेतु जेठ की धधकती धूप।
प्रेम और सम्मान की भूखी,
चाह न रखती ऊँची-ऊँची।
कोमल हृदय, ममता की मूरत,
सहनशीलता जिसकी सच्ची।
हर दुख में मुस्कान सजाए,
हर बोझ हँसकर सह जाए।
मकान को घर बना देती है,
प्रेम से सब कुछ सजाए।
अपने त्याग और तपस्या के बदले,
चाहे बस थोड़ा सा सम्मान।
दूहीता भी, शक्ति भी नारी,
उससे ही जग की पहचान।
नारी ही आधार जगत का,
नारी ही अनुपम स्वरूप।
हर रूप में उज्ज्वल ज्योति सी,
नारी का अद्भुत रूप।
-श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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