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जियो और जीने दो: आज की सबसे बड़ी आवश्यकता - प्रो. आरके जैन “अरिजीत” शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)


 

[प्रसंगवश: महावीर जयंती]

जियो और जीने दो: आज की सबसे बड़ी आवश्यकता

महावीर जयंती: आत्ममंथन, संयम और जागृति का पावन पर्व

[एक ज्योति जो युगों से जल रही है: भगवान महावीर की विचारधारा]

           जब मानवता मार्ग से विचलित होती है, हिंसा, लोभ और असत्य का अंधकार फैलता है, तब इतिहास में एक दिव्य प्रकाश प्रकट होता है, जो युग को दिशा देता है और पीढ़ियों को प्रेरित करता है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व वैशाली के समीप कुंडलपुर की पावन भूमि पर जन्मे भगवान महावीर स्वामी ऐसी ही अद्वितीय विभूति थे। उनका जन्म मात्र एक तीर्थंकर का आगमन नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतना-क्रांति का आरंभ था, जिसने मानव जीवन को अहिंसा, करुणा और सत्य के उच्चतम आदर्शों तक पहुंचाया। उनके विचार आज भी उतने ही सजीव और प्रासंगिक हैं, जितने उस समय थे—यह सिखाते हुए कि सच्ची विजय हिंसा नहीं, प्रेम और संयम से प्राप्त होती है।

जब सत्य और आत्मबोध की खोज प्रबल होती है, तब महापुरुषों का जीवन मार्गदर्शक बनता है। 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को जन्मे भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, किंतु उनका दर्शन किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा। वे विश्व-गुरु थे, जिनके संदेश ने समस्त मानवता को नई दिशा दी। "अहिंसा परमो धर्मः" उनका अमर सिद्धांत था—जो केवल वाणी नहीं, बल्कि जीवन का आधार है, जिस पर शांति और समृद्धि टिकी है। उन्होंने सिखाया कि सिद्धांतों को कहना नहीं, जीना आवश्यक है। राजसी वैभव त्यागकर और 12 वर्षों की कठोर तपस्या के पश्चात कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने सिद्ध किया कि आत्मबल ही सर्वोच्च शक्ति है।

महावीर का जीवन स्वयं एक सजीव विश्वविद्यालय था। 30 वर्ष की आयु में संन्यास लेकर उन्होंने जो मार्ग अपनाया, वह अत्यंत कठोर था। नंगे पांव, बिना किसी संपत्ति के, विपरीत परिस्थितियों और उपहास के बीच भी वे अडिग रहे। उनकी तपस्या केवल बाहरी कष्ट नहीं, बल्कि मन, क्रोध और लोभ पर विजय की आंतरिक साधना थी। कैवल्य ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने 30 वर्षों तक जन-जन को यह सिखाया कि जीवन का लक्ष्य भौतिक सुख नहीं, आत्म-मुक्ति है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे उनके पंच महाव्रत आज भी जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने की राह दिखाते हैं।

वर्तमान समय में भगवान महावीर के संदेश और भी अधिक सार्थक प्रतीत होते हैं। विश्व में हिंसा, युद्ध, आतंकवाद और पर्यावरण संकट चरम पर हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते दशक में 20 लाख से अधिक लोग हिंसक संघर्षों से विस्थापित हुए हैं और जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक आपदाएँ 35% बढ़ी हैं। ऐसे दौर में उनका "जियो और जीने दो" सिद्धांत केवल आदर्श नहीं, एक व्यावहारिक मार्ग है। यदि मानवता का एक अंश भी अहिंसा और संयम अपनाए, तो संघर्ष घट सकते हैं और प्रकृति से संतुलन स्थापित हो सकता है। शाकाहार अपनाने से न केवल हिंसा कम होती है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी घटता है—यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है।

भारत में जैन समुदाय इसका सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग 45 लाख अनुयायी आज भी महावीर के सिद्धांतों को जीवन में उतारते हैं। वे अहिंसा के साथ दान, संयम और सेवा द्वारा समाज को सुदृढ़ बनाते हैं। यह संयोग नहीं कि भारत जैसे विविध देश में सह-अस्तित्व की भावना जीवित है—इसका श्रेय महावीर के दर्शन को है। उनके पंच महाव्रत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं—अहिंसा हिंसा से दूर रखती है, सत्य नैतिकता सिखाता है, अस्तेय लोभ से बचाता है, ब्रह्मचर्य संयम देता है और अपरिग्रह संग्रह की प्रवृत्ति को त्यागना सिखाता है। ये सिद्धांत व्यक्ति ही नहीं, समाज को भी समृद्ध बनाते हैं।

महावीर जयंती का दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का एक पवित्र अवसर है—एक ऐसा क्षण, जो हमें अपने भीतर झांकने और आत्म-मंथन करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म मंदिरों की भव्यता या रस्मों के शोर में नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के सरल, पवित्र और सच्चे कर्मों में निहित है। यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर की कमजोरियों—हिंसा, क्रोध और ईर्ष्या—को पहचानें और दृढ़ संकल्प के साथ उन्हें समाप्त करने का प्रयास करें। आज के समय में, जब सोशल मीडिया नफरत और विभाजन को बढ़ावा दे रहा है, महावीर का संदेश एक प्रकाशस्तंभ की तरह हमें मार्ग दिखाता है—यह सिखाता है कि वाणी में संयम और विचारों में शुद्धता ही सच्ची मानवता की पहचान है।

मानव जीवन के समक्ष आज दो स्पष्ट और निर्णायक मार्ग खड़े हैं—या तो हम उस गहन अंधकार में विलीन हो जाएं, जहां हिंसा, स्वार्थ और विनाश की शक्तियां प्रभावी हैं, या महावीर की तपस्या से प्रज्ज्वलित उस दिव्य, शाश्वत ज्योति को पूर्ण श्रद्धा से अपनाएं। यह ज्योति हमारे हृदय में शांति, करुणा और संतुलन का संचार करती है तथा ऐसे विश्व की कल्पना को साकार करती है, जहां प्रत्येक प्राणी प्रेम, सम्मान और सह-अस्तित्व के साथ जीवन व्यतीत करता है। आज, इस पावन और प्रेरणादायी क्षण में, हमें एक दृढ़ और अटूट संकल्प लेना चाहिए—अहिंसा को अपने जीवन का मूल आधार बनाएं, सत्य को अपनी अडिग शक्ति और करुणा को वह दिव्य प्रकाश, जो संपूर्ण संसार को प्रेम, सद्भाव और मानवता की उज्ज्वल आभा से आलोकित कर दे।

महावीर का जीवन एक प्रखर संदेश, जागृत पुकार और अनंत प्रेरणा का स्रोत है। वे बताते हैं कि सच्ची विजय बाहरी संसार में नहीं, बल्कि अपने ही मन के गहरे संघर्षों को जीतने में निहित है। जब हम उनके दिव्य दर्शन को आत्मसात कर अपने आचरण में उतारते हैं, तब उनका प्रकाश हमारे जीवन, समाज और संपूर्ण विश्व को निरंतर आलोकित करता है। यही उनकी जयंती का वास्तविक अर्थ है—एक ऐसी शाश्वत विजय, जो समय की सीमाओं से परे जाकर सदैव मानवता को मुक्ति का पथ दिखाती रहती है। महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। जय महावीर—जय विश्व शांति, जय विश्वमंगल।

 - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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