काव्य :
सौगातें हैं
सूखा है बरसाते हैं।
जीवन की सौगातें हैं।
जीत हमेशा कहां रही।
बीच- बीच में मातें हैं।
बैठो तुम भी कुछ सीखो ।
सुंदर कई जमाते हैं ।
हर ईनाम बहुत प्यारा।
दिन कितना सिखलाते हैं।
शादी की खातिर सजती।
पास यहीं बारातें हैं।
दिन अब छुपने जाता है ।
झुकने वाली रातें हैं।
- आर एस माथुर , इंदौर
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