ठाकुर श्री द्वारकाधीश बने धनुर्धारी राम, मनमोहक छवि ने किया मंत्रमुग्ध
बड़े मंदिर में गूंजा 'भये प्रगट कृपाला', धूमधाम से मनाया गया श्री राम जन्मोत्सव
इटारसी। इटारसी सहित सम्पूर्ण नर्मदांचल की आस्था के प्रमुख केंद्र ठाकुर श्री द्वारिकाधीश बड़ा मंदिर तुलसी चौक में शुक्रवार को श्रीराम नवमी के अवसर पर भगवान द्वारकाधीश की प्रतिमा का श्रृंगार धनुर्धारी प्रभु श्रीराम के रूप में किया गया। जिसने भी यह छवि देखी वो निहारता ही रह गया। मन को शीतल और सुखमय करने वाली छवि ने भक्तजनों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उल्लेखनीय है कि शुक्रवार दोपहर राम जन्म के समय द्वारकाधीश को श्रीराम की पोशाक पहनाई गई थी एवं उन्हें धनुष भी धारण कराया था। दोपहर में 12 बजे घंटे बजने लगे, आतिशबाजी हुई। श्रीराम जन्म महोत्सव अंतर्गत जारी श्रीराम कथा में प्रवचन दे रहे श्रीमदप्रयागपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी शंकराचार्य ओंकारानंद सरस्वती महाराज ने व्यापाठ से बधाई के गीत गाए, मंदिर के पुजारी पं. सुधीर शर्मा, पं पीयूष शर्मा सहित बड़ी संख्या में विप्र बंधुओं ने प्रातःकाल से भगवान का अभिषेक एवं पूजन-अर्चन किया एवं राम जन्म की आरती की। इस अवसर पर मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं विधायक डॉ. सीतासरन शर्मा, श्रीराम जन्म महोत्सव समिति के संरक्षक प्रमोद पगारे, नगरपालिका अध्यक्ष पंकज चौरे, नगर भाजपा मंडल अध्यक्ष राहुल चौरे, रमेश चांडक, जसवीर सिंह छाबड़ा, सतीश अग्रवाल, उमेश अग्रवाल, श्रीराम जन्म महोत्सव समिति के अध्यक्ष नीरज जैन, कार्यकारी अध्यक्ष विपिन चांडक, उपाध्यक्ष विष्णु शंकर पांडे, सचिव अभिषेक तिवारी, संयुक्त सचिव शैलेन्द्र दुबे, कोषाध्यक्ष प्रकाश मिश्रा, सहकोषाध्यक्ष अमित सेठ, प्रवक्ता भूपेंद्र विश्वकर्मा, घनश्याम तिवारी, देवेंद्र पटेल, दिनेश सैनी सहित बड़ी संख्या में मंदिर समिति एवं श्री राम जन्म महोत्सव समिति के पदाधिकारी, सदस्य एवं बड़ी संख्या में भक्तगण मौजूद रहे।
द्वारिकाधीश मंदिर परिसर में दोपहर 11 बजे श्रीराम जन्म महोत्सव का आयोजन प्रारंभ हुआ। व्यासपीठ से महाराज श्री ने कहा कि त्रेतायुग में चक्रवती सम्राट राज दशरथ के यहां प्रभु श्रीराम का जन्म मानव अवतार में होना यह घटना नहीं थी, किंतु विधाता का निश्चित किया हुआ कार्य था। उन्होंने कहा कि राम त्रेतायुग की आवश्यकता थे। सनातन संस्कृति को बचाने और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए उनका जन्म लेना जरूरी था और उन्होंने पृथ्वी पर जन्म भी इसलिए लिया कि ब्राम्हण, गाय, सुर और संत की वे रक्षा कर सके। प्रभु श्रीराम का संपूर्ण जीवन मर्यादा का रहा और इसी मर्यादा के चलते प्रभु श्रीराम आज भी कलयुग में मर्यादा पुरूषोत्तम के नाम से जाने जाते है। इसी के साथ नौ दिवसीय श्रीराम कथा का विश्राम हुआ। इस अवसर पर मंदिर परिसर में आए श्रद्धालुओं को प्रसादी का वितरण किया गया।
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