काव्य :
है स्वर्ग धरा पर ही धरा
है स्वर्ग धरा पर ही धरा
हम देखें तो बिखरा,पसरा
चाहत, उस स्वर्ग की मिथ्या है
आकांक्षा लेकर ,जो मनुज मरा
करुणा,प्रीत और क्षमा
सब धन तो, तुझमे ही जमा
संवेदन ,अपना व्यर्थ न कर
तूँ ,परोपकार में रह ,रमा
नयन खोल और खेत देख
तूँ पुष्प,पीत और श्वेत देख
हरे वस्त्र में लिपटी देख धरा
फल,फूल,पत्र सब तो है खरा
यहाँ विविध जीव का जीवन है
पृथ्वी,गगन ,जल, पवन है
सब जीवों के कर्म,कुकर्म है
सुकर्म ही स्वर्ग का मर्म है
भूख अर्जन की,तूँ ना रख
संतोष हैअमृत, तूँ वह चख
रंग,उमंग,हर्ष,दुःख, सुख
हैं जीवन में,सबके सम्मुख
स्वर्ग कहीं यदि है जगह
है निज मन मे,इसी जगह
ब्रज ,प्रकृति में ही स्वर्ग तूँ पा
सुकर्म ,संतोष में जीता जा
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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