काव्य :
मेरे हमसफ़र के नाम...
क्या तुम थाम पाओगे हाथ मेरा?
एक लंबा फासला तय करना है,
तुझे तेरी जिंदगी से मेरी जिंदगी का।
मैं नादान हूँ, सीधी-साधी हूँ,
नटखट हूँ, शरारती हूँ,
बड़े नवाबों से पली हूँ...
क्या मुझे तुम सह पाओगे?
तेरे से लड़ूँ, तो क्या तू भुला पाएगा?
थोड़ी पागल हूँ, बच्ची हूँ,
पर मन की सच्ची हूँ।
मुझे खिलौने पसंद हैं, क्या तू दिला पाएगा?
तेरी और मेरी जिंदगी का फासला लंबा है,
क्या तू इसे तय कर पाएगा?
घूमने का शौक है, क्या तू घुमा पाएगा?
मेरी नादानियों को नजरअंदाज कर पाएगा?
मेरे सपने पंछियों से उड़ने के हैं,
क्या तू मुझे उड़ने दे पाएगा?
जब रूठूँ, तो मना लेना,
मेरा फोन एक बार में उठा लेना,
बस इतना ही चाहिए, क्या तू दे पाएगा?
कभी रोने न देना,
अगर रोऊं... तो कंधा दे देना,
बस यही है मेरी जिंदगी...
क्या तू ये फासला तय कर पाएगा?
क्या तू हाथ थाम पाएगा?
- वैभवी मिश्रा, प्रयागराज
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